दूसरे आंग्ल-सिख युद्ध के कारण | Second Anglo Sikh War In Hindi

दूसरे एंग्लो सिख-युद्ध का मूल कारण अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति थी। पहले सिख युद्ध के बाद उन्होंने कुछ सैन्य और आर्थिक कारणों के परिणामस्वरूप पंजाब को अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया था, फिर भी उनकी गिद्ध जैसी आँखें इस पर टिकी थी। खालसा सेना में बदले की भावना बड़ी तीव्र थी। गोहत्या की घटना, पंजाबियों के सामाजिक जीवन में अंग्रेजों का हस्तक्षेप, महारानी जिंदा के साथ दुर्व्यवहार, अंग्रेजों की सैन्य तयारी, लॉर्ड डलहौजी की विस्तारवादी नीति, दीवान मूलराज, चतर सिंह, शेर सिंह और महाराज सिंह के विद्रोह आदि कई कारणों से दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के लिए जिम्मेदार थे।

  1. अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति - जब से अंग्रेज भारत आए थे, वे साम्राज्यवादी नीति पर चलते आएं थे। उन्होंने कई स्वदेशी राज्यों हड़प लिया था। उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह के समय से ही पंजाब के सिख राज्य को घेरने की नीति अपनाई रखी थी। प्रथम सिख युद्ध के बाद कई राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक जटिलताओं के कारण पंजाब को अपने साम्राज्य में शामिल नहीं किया, लेकिन लाहौर की दो संधियों और भैरवाल की संधि द्वारा उन्होंने खालसा राज की स्थिति बहुत कमजोर कर दी। पंजाब को भी आपने साम्राज्य में मिला लेनें की उनकी प्रबल इच्छा ही इस युद्ध का असली कारण थी।
  2. लॉर्ड डलहौजी की गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्ति - 1848 ई. में लॉर्ड डलहौजी भारत का गवर्नर जनरल बन कर आया। वह बहुत साम्राज्यवादी विचारों और विस्तारवादी नीति का पक्षपाती थे। उन्होंने लैप्स के सिद्धांत और अन्य साधनों के माध्यम से की भारतीय शाशको को उनके राज्यों, पेंशन, उपाधि आदि से वंचित कर दिया था। उसने पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का फैसला कर लिया। इस निर्णय का परिणाम दूसरा सिख युद्ध था।
  3. लाहौर और भेरोवाल की संधियों से पंजाबी असंतुष्ट - प्रथम सिख युद्ध में जीत के बाद अंग्रेजों ने लाहौर दरबार और लाहौर की दो संधियों और भैरोवाल की संधि थोप दी। जलंधर दोआब के सभी मैदानी क्षेत्रों और पहाड़ी क्षेत्रों पर अंग्रेजों ने कब्ज़ा कर लिया। ब्यास और सिंधु नदी के बीच के पहाड़ी क्षेत्रों को युद्ध के मुआवजे के रूप में सिखों से प्राप्त करके उनके आपने दोस्त गुलाब सिंह को बेच दिया। पंजाब का शासन व्यावहारिक रूप से उनके हाथों में आ गया। रणजीत सिंह का शासनकाल टूटता हुआ प्रतीत हो रहा था। इन सबके कारण पंजाब की पूरी जनता में गुस्सा फैल गया। वह अंग्रेज़ी प्रभुत्व का जूला तोड़ना चाहती थी, लेकिन युद्ध लड़े बिना यह संभव नहीं हो सकता था।
  4. सिख सेना में बदलें की इच्छा - सिख सेना में प्रथम सिख युद्ध में अपनी हार के बाद, बदले की भावना तीखी हो गई थी। जब ये सैनिक युद्ध में हार कर अपने गाँव लौटते थे, तो लोग उन्हें तानें मारते थे - "क्यों खालसा जी पूरीया पा आए"? इस से उनका खून खौलने लगा था। इसके अलावा उनको यह पूरा भरोसा था कि पहले एंग्लो-सिख युद्ध में उनकी हार इस लिए नहीं हुई थी कि उनकी बहादुरी और साहस में कमी थी बल्कि उनकी हार तो विश्वासघाती सरदारों (लाल सिंह, तेज सिंह और गुलाब सिंह) के कारण हुआ थी। वे बदले की भावना और आशा की एक नई किरण को लेकर अंग्रेजों से लड़ना चाहते थे।
  5. लाहौर के सरदारों के साथ बदसलूकी - विश्वासघाती सरदार लाल सिंह और तेज सिंह और महाराजा दलीप सिंह की माँ महारानी जिंदा अंग्रेजों द्वारा उनके द्वारा प्रति विहार से खुश नहीं थे। लाल सिंह और तेजा सिंह बहुत लालची थे। अंग्रेजों ने उन्हें तुच्छ बना दिया था। प्रधानमंत्री लाल सिंह के उपर मुकदमा चला कर उसको दोषी ठहराया गया और बनारस भेजा दिया गया। इस बदसलूकी से अन्य सिख सरदार भी भयभीत हो गए। वह अंग्रेजों के विरुद्ध सैनिक तैयारी करने लगे।
  6. महारानी जिंदा के साथ बदसलूकी - महाराजा रणजीत सिंह की विधवा और महाराजा दलीप सिंह की माँ महारानी जिंदा एक बहुत उच्च इरादों वाली औरत थी। अंग्रेजों को लगा कि जब तक उसका लाहौर दरबार के शासन पर प्रभाव रहेगा, वह अंग्रेजों की दाल नहीं गलने देंगी। इसलिए भैरवाल की संधि द्वारा अंग्रेजों ने उन्हें नाबालिग महाराजा की सुरक्षा के पद से हटा कर उनकी सालाना पेंशन 1.5 लाख रुपये तय कर दी गई। शासन का कार्य अंग्रेजी रैजीडेंट ने अपने हाथ में ले लिया। इतना ही नहीं, कुछ समय बाद महारानी की पेंशन घटाकर 48,000 रुपये प्रति वर्ष कर दी गई और बाद में केवल 12,000 रुपये प्रति वर्ष। महारानी को पहले शेखूपुरा और बाद में बनारस भेजा दिया गया। वास्तव में अंग्रेज़ उसे पंजाब की राजनीति से दूर रखना चाहते थे, क्योंकि वह सिख विद्रोहियों का केंद्र बिंदु बन सकती थी। सिख समुदाय ने महारानी जिंदा का राज्य माता के रूप में सत्कार करती थी। उसके साथ किए गए अंग्रेजों की बदसलूकी के कारण पूरे पंजाब में रोस की लहर फैल गई। यह दूसरे सिख युद्ध का एक मुख कारण बन गया।
  7. गोहत्या की घटना - 1846 ई. में लाहौर में एक दिन अंग्रेज़ संतरी के रास्ते में कुछ गाए आ गई। उसने गुस्से में आकर गायों को घायल कर दिया। हिंदू और सिख गाए को माता के समान मानते थे। इसलिए उनके बीच रोस व्यापक हो गई। लोगों ने घरों पर पत्थर फेंके। इस से कुछ अंग्रेज़ अधिकारी घायल हो गए। अंग्रेजों ने कई लोगों को गिरफ्तार करके सजाए दी। एक व्यक्ति मिसर रुलिया राम को तो फांसी दे दी गई। इस घटना से सिख भड़क गए।
  8. अंग्रेजों के कुछ प्रशासनिक कदम - लॉरेंस भाईयों ने जलंधर दोआब और लाहौर दरबार के क्षेत्र में भूमि कर से संबंधित कई लाभदायक सुधार किए। भूमि को मापने का काम शुरू करवाया। लोग समझने लगे थे कि यह तो पंजाब और अंग्रेजों की कब्जा कर लेने की तैयारीयां है। इसलिए आम जनता अंग्रेजों के खिलाफ हो गई।
  9. पंजाबियों के सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप - दुसरे खिख युद्ध का एक कारण यह था कि लाहौर दरबार के अंग्रेज़ अधिकारी पंजाबियों के सामाजिक जीवन में भी हस्तक्षेप करने लगा थे। उन्होंने सती प्रथा और कन्या हत्या के ख़िलाफ़ प्रचार किया। रूढ़िवादी पंजाबी समाज इस को अपने समाजिक जीवन में नाजायज दख़ल मानते थे।
  10. अंग्रेज़ सैनिकों की चरित्रहीनता - लाहौर में रहने वाले अंग्रेज़ सैनिक लोगों के साथ दुर्व्यवहार करते थे और औरतों का अपमान करते थे। कभी-कभी वे हरिमंदिर साहिब में जूते पहन कर ही चले जाते थे। उनकी इन हरकतों से पंजाबियों का खून खौलने लगता था।
  11. सिख सेना की छांटी और तनख्वाह में कमी - अंग्रेज खालसा सेना की शक्ति और प्रभाव को कम करना चाहते थे। यह पंजाब पर कब्जा करने के लिए बहुत जरूरी था। लाहौर की संधि से सिख सैनिकों की संख्या घटकर 20,000 तक पैदल और 12,000 घोड कर दी गई थी। हजारों बेकार सैनिक अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए तैयार बैठे थे। इस के अलावा सैनिकों की तनख्वाह की कमी की कमी भी सिखों को चुभने लगी।
  12. स्वतंत्रता और युद्ध पसंद सिख - सिख राष्ट्र के अपने कुछ चरित्र गुन है। वो स्वतंत्रता और युद्ध पसंद है। उसके यह चरित्र गुन ही उन्हें अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ने की प्रेरित देते थे।
  13. दीवान मूल राज का विद्रोह - दीवान मूल राज को 1844 ई. में मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया गया था। वह लाहौर दरबार को सालाना 12 लाख रुपये देता था। अंग्रेजों ने इस राशि को बढ़ाकर 18 लाख रुपये कर दिया और उनके बाद राज्य का 1/3 हिस्सा भी उससे ले लिया। उसने कई बार अनुरोध किया कि वह इतनी बड़ी राशि का भुगतान करने में सक्षम नहीं है। इसलिए इसे कम किया जाए। उसकी बात ना मानने पर 19 अप्रैल, 1848 ई. को उसने इस्तीफा देकर गवर्नरी के काम का भार अंग्रेजों द्वारा नियुक्त किए गए गवर्नर कहन सिंह को सौंप दिया। काहन सिंह की मदद के लिए दो अंग्रेज़ अधिकारी एग्न्यू (Agnew) और एंडरसन (Anderson) भी आएं थे। इनके वहां पहुंचने पर लोग भड़क गए। उन्होंने इन अधिकारियों की हत्या कर दी और मूल राज्य को अंग्रेजों के ख़िलाफ़ शुरू किए गए विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए मजबूर किया। बहुत गिनती में लोग मूल राज्य के झंडे के नीचे इकट्ठा होने लगें। अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने के बजाय फैलने दिया ताकि लाहौर दरबार पर हमला करने का बहाना मिल सके।
  14. चतर सिंह का विद्रोह (1848 ई.) - हजारा के शासक चतर सिंह अटारी वाला की बेटी की सगाई महाराजा दलीप सिंह से हुई थी। उसने अंग्रेजों को इस शादी की तारीख तय करने बार-बार अनुरोध किया, लेकिन वो इस बात को टालते रहे, क्योंकि वह दो शक्तिशाली शाही परिवारों को इकट्ठा नहीं होने देना चाहते थे। इस लिए उनकी अपनी स्थिति ख़तरे में पड़ सकती थी। दूसरी ओर चितर सिंह अंग्रेजों के इस व्यवहार से बहुत दुखी था। अंग्रेजों ने उसके खिलाफ हजारा के मुसलमानों को विद्रोह करने के लिए भड़काया। कर्नल कनोरा (Col. Camora) नामक एक सैन्य अधिकारी ने चतर सिंह के हुक्म को मानने से इन्कार कर दिया और दो सिख अधिकारियों को अपने पिस्तौल से मार डाला। इस के बाद जल्दी ही कैनौरा को गोली मारकर उड़ा दिया। अंग्रेजों ने चतर सिंह को नाज़िम के पद से हटा दिया और उनकी जागीर को जब्त कर लिया। अब चतर सिंह के पास विद्रोह (अगस्त, 1848 ई.) के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
  15. शेर सिंह का विद्रोह - जब अपने पिता चतर सिंह के विद्रोह की सूचना शेर सिंह को मिली तो उसने भी विद्रोह कर दिया। 1 अक्टूबर, 1848 ई. को वह अपने पिता के साथ जाकर मिल गया।
  16. अंग्रेजों का हमला और युद्ध का आरम्भ - दीवान मूल राज, चतर सिंह और शेर सिंह के विद्रोह करके गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौज़ी को पंजाब पर हमला करने का बहाना मिल गया। काफ़ी समय से वो इस बहाने की तलाश में थे। 9 नवंबर, 1848 ई. को अंग्रेजी सेना के सतलज नदी को पार करने से दूसरा सिख युद्ध शुरू हो गया।
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