प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के कारण, घटनाएँ और परिणाम (1845-46)

सबराव की लड़ाई (20 फरवरी, 1846) में लाल सिंह और तेज सिंह की विश्वासघात के कारण सिख सेना आखिर अंत में पराजित हो गई। शाम सिह अटारी वाला वीरता से लड़ते हुए शहीद हो गए। इस लड़ाई में 3125 सिख सैनिक मारे गए। तेज सिंह ने रणभूमि में से भागते समय सतलज नदी पर बनाये गए नावों के पुल को तोड़ दिया। इस से हजारों सिख सैनिक नदी में डूब कर मर गए। विजयी अंग्रेज़ सेना 20 फरवरी, 1846 ई. को लाहौर पहुँच गई। मुदकी, फ़िरोज़शाह, बादडोवाल, अलीवाल और सबराओं की लड़ाई में सिखों का बहुत ज्यादा जान-माल का नुकसान हुआ था। इस युद्ध के विभिन्न युद्धों में सिखों की हार ने महाराजा रणजीत सिंह के राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया। इसके कई प्रभाव थे -

लाहौर की पहली संधि (First Treaty Of Lahore, 9 मार्च, 1845 ई.)

लाहौर दरबार के विश्वासघाती सरदारों के साथ बातचीत के बाद अंग्रेज़ प्रतिनिधि - फ्रेडरिक करी और हेनरी लॉरेंस ने लाहौर की पहली संधि पर 9 मार्च, 1845 को हस्ताक्षर किए। यह संधि महाराजा रणजीत सिंह के 7½ साल के पुत्र महाराजा दलीप सिंह पर थोपी गई। संधि की शर्तें नीचे लिखीं गई है।

संधि की शर्ते

  1. अंग्रेजी सरकार और महाराजा दलीप सिंह और उनके उत्तराधिकारियों के बीच हमेशा शांति और मित्रता रहेगी।
  2. सतलज और ब्यास नदियों के बीच के सभी मैदान और पहाड़ी क्षेत्र और क़िले अंग्रेजों का कब्ज़ा होगा।
  3. लाहौर दरबार पर 1.5 करोड़ रुपए युद्ध के हर्जाने के रूप में थोपें गए। क्योंकि इतनी बड़ी धनराशि लाहौर दरबार दे सकता था, इसलिए उसके स्थान पर सिख साम्राज्य के ब्यास और सिंधु नदी के बीच के सभी पहाड़ी इलाके अंग्रेजों को दे दिया गया। इसके अलावा लाहौर सरकार ने अंग्रेजों को 50 लाख रुपये देने का वादा किया।
  4. सिख सेना की गिनती 25 बटालियन (20,000 पैदल सेना) और 12,000 घुड़सवार सेना निर्धारित कर दी गई।
  5. सिखों ने युद्ध में अंग्रेजो से शीनी हुए सभी भारी तोपों को अंग्रेजों को सौंपने के लिए सहमत हो गए।
  6. अंग्रेजी सेना को आवश्यकता पड़ने पर पंजाब को पार करने की स्वतंत्रता होगी।
  7. महाराजा दलीप सिंह ने कसम खाई कि वह अंग्रेजों की सहमति के बिना किसी अंग्रेज, अन्य यूरोपीय या अमेरिकी को अपनी सेना में भर्ती नहीं करेगा।
  8. अंग्रेजों ने दलीप सिंह को लाहौर दरबार का महाराजा, उनकी माँ को उनकी रक्षक और लाल सिंह को उसके के प्रधान मंत्री के रूप में मान्यता दी।
  9. अंग्रेज़ लाहौर दरबार के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, लेकिन जिन मामलों में उनसे पूछा जाएगा, उनके बारे में वे लाहौर सरकार के हित में सलाह देंगे।
  10. डोगरा राजपूत राजा गुलाब सिंह की सिख-अंग्रेज़ मित्रता के संबंध में की गई सेवाओं के कारण अगर अंग्रेजों उसको कुछ पहाड़ी क्षेत्र प्रदान करेंगे तो महाराजा इन इलाकों पर गुलाब सिंह की प्रभुता को मंजूरी देगा।
  11. लाहौर सरकार और गुलाब सिंह के बीच होने वाले किसी भी झगड़े पर अंग्रेजी सरकार द्वारा किए गए, फैसलों को महाराजा  मंजूरी देगा।

लाहौर की दूसरी संधि (Second Treaty Of Lahore, 11 मार्च 1846 ई.)

पहली संधि के दो दिन बाद लाहौर की दूसरी संधि पर फिर अंग्रेजों और लाहौर दरबार के बीच हस्ताक्षर किए गए थे। इस के मुताबिक -

  1. महाराजा और लाहौर की सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सेना साल 1846 के अंत तक लाहौर में रहेगी। इस सेना को पहले हटाया जा सकता था, लेकिन इस अवधि की समाप्ति के बाद, यह किसी भी हालत में लाहौर में नहीं रहेगी।
  2. लाहौर के क़िले और शहर पर अंग्रेज सेना का कब्जा होगा। इस सेना का पूरा खर्च लाहौर दरबार को करना होगा।
  3. जो प्रदेश लाहौर की संधि द्वारा दिए गए थे, वहां के पुराने जागीरदारों के कब्जे उसी तरह सुरक्षित रहेंगे।
  4. अंग्रेजों को दिए गए प्रदेशों में तोपों के अलावा सारी संपत्ति और खज़ाना लाहौर सरकार को निकाल कर ले जाने की इजाजत होगी।

भैरोवाल की संधि (Treaty of Bhairowal, 16th Dec 1846)

इस संधि को लॉर्ड हार्डिंग के भैरोवाल नामक स्थान पर स्थित कैंप में मान्यता दी गई। इसीलिए

इसका नाम भैरोवाल की संधि रख दिया गया। इस पर 16 दिसंबर, 1846 ई. को हस्ताक्षर किए गए थे।

  1. जब तक महाराजा दलीप सिंह नाबालिग रहेगा तब तक उनका शासन अंग्रेज़ रैजीडैंट (English Resident) चलाएगा।
  2. शासन प्रबन्ध में अंग्रेज़ रैजीडेंट की रीजैंसी काउंसिल (Regency Council) सहायता करेंगी। इस परिषद के 8 मैंबर होंगे।
  3. महारानी जिंदा को दलीप सिंह के संरक्षक के पद से हटा कर उसकी डेढ़ लाख रुपए सालाना पेंशन लगा दी गई।
  4. महाराजा दलीप सिंह की सुरक्षा के लिए (1846 का साल बीत जाने के बाद) अंग्रेजी सेना लाहौर में रहेगी। इस काम के लिए वह किसी भी क़िले पर कब्जा कर सकेंगी। इस सेना का 22 लाख रुपए सालाना खर्च लाहौर सरकार प्रदान देगी।
  5. यह संधि तब तक लागू रहेगी जब तक कि (1854 ई. में) महाराजा दलीप सिंह वयस्क (18+) नहीं हो जाता।

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के परिणाम

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के पंजाब पर कई प्रभाव पड़े।

  1. इस युद्ध की विभिन्न लड़ाइयों (मुंदकी, फ़िरोज़ शाह, बदोवाल, अलीवाल और सभराँव) में सिख सेना का जान-माल का भारी नुकसान हुआ। फिर फ़िरोज़ शाह की लड़ाई में 12,000 सैनिक मारे गए थे। लाहौर दरबार की 36 तोपें भी अंग्रेजों के कब्जे में आ गई। लाहौर दरबार पर डेढ़ करोड़ रुपए की भारी रकम युद्ध के हर्जाने के रूप में लगाई गई।
  2. लाहौर की संधि के द्वारा दोआब बिष्ट जालंधर (सतलज और ब्यास नदियों के बीच का क्षेत्र) के सभी मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया। इस के अलावा ब्यास और सिंध के बीच के पहाड़ी इलाकों पर भी अंग्रेजों का अधिकार हो गया। उन्होंने यह इलाका (कश्मीर) राजा गुलाब सिंह को दे दिया। इस तरह कश्मीर के एक अलग स्वतंत्र डोगरा राजपूत (गुलाब सिंह के अधीन) की स्थापित हुई।
  3. ब्यास और सिंधु नदियों के बीच के पहाड़ी क्षेत्र को युद्ध के हर्जाने के रूप में अंग्रेजों ने प्राप्त कर लिया। उन्होंने यह पहाड़ी इलाका (जम्मू और कश्मीर) राजा गुलाब सिंह के हाथ बेच दिया। इस तरह गुलाब सिंह के अधीन जम्मू और कश्मीर के अलग राज्य की स्थापना हुई।
  4. लाहौर दरबार की शासन प्रणाली पर अंग्रेजों का (ब्रिटिश रेजिडेंट के द्वारा) कब्ज़ा हो गया। महाराजा और अन्य सरदार तो सिर्फ अंग्रेजों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गए। अंग्रेजों ने इस अधिकार का नाजायज लाभ उठाकर, लाहौर राज्य में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया। अंदर ही अंदर उन्होंने लाहौर दरबार को खोखला कर रहे थे।
  5. अंग्रेजी सेना स्थाई रूप से (भैरव की संधि के द्वारा) लाहौर में रह गई। इसका खर्च (22 लाख रुपए सालाना) भी लाहौर दरबार को देना पड़ता था। इस सेना के कारण दुसरे सिख-युद्ध में अंग्रेजों का काम आसान हो गया।
  6. पहले सिख युद्ध में सिखों की हार के साथ लाहौर दरबार के सम्मान पर बुरा प्रभाव पड़ा। महाराजा रणजीत सिंह की कड़ी मेहनत और प्रयासों से निर्मित विशाल साम्राज्य टूटने लगा था।
  7. प्रथम सिख युद्ध में सिखों की हार सिखों द्वारा स्वीकार नहीं की गई थी। उनका यह विचार था कि अगर उनके सरदार (लाल सिंह, तेज सिंह और गुलाब सिंह) लाहौर दरबार के साथ धोखा नहीं करते तो वो युद्ध में अंग्रेजों से कभी भी नहीं हारते। उन्हें विश्वास था कि भविष्य में जीत उसकी ही होंगी। इस विश्वास ने दूसरे सिख युद्ध के बीज बो दिए।
  8. यदि वे चाहें तो अंग्रेज़ सारे लाहौर राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला सकते थे, लेकिन उस समय उन्होंने इसमें कोई राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक लाभ नहीं समझा। उन्हें यह डर था कि अगर उन्होंने सिख राज्य पर कब्जा कर लिया तो पुरा सिख राष्ट्र भड़क उठेगा। ऐसी स्थिति अंग्रेजों के लिए बहुत ही हानिकारक साबित हो सकती थी। अभी तक उन्होंने पंजाब की आर्थिक स्थिति का पूरा ज्ञान नहीं था। हो सकता था कि पंजाब पर कब्जा करना, कोई घाटे का सौदा ही बन जाता।

संक्षेप में, हम कह सकते है कि प्रथम सिख-युद्ध के कारण महाराजा रणजीत सिंह का राज्य बहुत कमज़ोर बन गया। उनके सम्मान को बहुत धक्का लगा। अंग्रेजों द्वारा पंजाब पर कब्ज़ा करने के लिए रास्ता खुल गया। शासन की बागडोर अंग्रेजों के हाथ में आ गई और पंजाब के काफी हिस्से पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया। जान-माल का भारी नुकसान हुआ। सिखों की बदला की भावना ने दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध को जन्म दिया।

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