प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के कारण

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु (जून, 1839 ई.) के बाद पंजाब में उथल-पुथल और राजनीति अस्थिरता का माहौल पैदा हो गया। उनके उत्तराधिकारी (खरक सिंह, नौनिहाल सिंह, रानी चंद कौर और शेर सिंह और दलीप सिंह) में से कोई भी इतना योग्य साबित नहीं हुआ कि वो महाराजा के साम्राज्य को संभाल सके। सिंहासन के लिए झगड़े और मारपीट होने लगी। अंग्रेज पहले से ही इस स्थिति का इंतजार कर रहे थे।

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के कारण

उन्होंने रणजीत सिंह के समय में पंजाब के सिख राज्य को घेरने की नीति अपनाई हुई थी। प्रथम अफगान युद्ध में अंग्रेजो की हार के लिए भी सिखों के समर्थन नहीं करने के लिए भी सिखों को दोषी ठहराया जा रहा था। अंग्रेजों द्वारा सिंध पर कब्जा (1843 ई.), लॉर्ड एलेनबरा (Ellenborough) की पंजाब पर कब्जा करने की योजना, लॉर्ड हार्डिंग (Lord Hardinge) का सिख विरोधी दष्टिकोन, अंग्रेजो की सैन्य तैयारीयां, मेजर ब्रॉडफुट (Broadfoot) का सिख विरोधी होना और लाल सिंह और तेज सिंह जैसे सिख सरदारों का अंग्रेजों के साथ मिल जाना आदि पहले एंग्लो-सिख युद्ध के कुछ कारण थे।

रणजीत सिंह की विधवा महारानी जिंदन, खालसा सेना के लड़ाकू स्वभाव से बहुत परेशान हो चुकी थी। इसलिए इसकी शक्ति को कम करने के लिए वो इस को अंग्रेजों के साथ युद्ध में लड़ना चाहती थी। 11 दिसंबर, 1845 ई. को लाल सिंह और तेज सिंह के कहने पर सिख सेना ने सतलुज नदी को पार किया और इसके दो दिन बाद गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने सिखों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दीं। 

प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (ANGLO-SIKH WAR) के कारण

महाराजा रणजीत सिंह के समय से अंग्रेजों की नज़र पंजाब के सिख राज्य पर थी। पर उस समय महाराजा की सैनिक शक्ति और अफगानिस्तान के उस पार रूस का बढ़ते प्रभाव के कारण, वे सिख राज्य पर हमला करने की हिम्मत नहीं कर सकते थे। उन्होंने धीरे-धीरे रणजीत सिंह की शक्ति को सीमित करना और इस प्रदेश में अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। अमृतसर की संधि (1809) और त्रिपक्षीय संधि (Tripartite Treaty, 1838) इसी दिशा में उठाए गए कदम कम थे। महाराजा की मृत्यु (1839 ई.) के बाद उनके राज्य में ग्रह युद्धों और राजनीतिक साजिशों के कारण राज्य में आई कमजोरी का अंग्रेजों ने पूरा फायदा उठाया।

उन्होंने लाल सिंह, गुलाब सिंह और वैतूरा जैसे प्रमुखों और उच्च अधिकारियों के साथ मेल-जोल रखने शुरू कर दिए। रणजीत सिंह के अयोग्य उत्तराधिकारी न तो विशाल साम्राज्य पर अपना नियंत्रित नहीं कर सकते और न ही उनके सेना पर नियंत्रण था। वे सिख सेना को अंग्रेजों के साथ लड़कर सिख सेना को कमजोर करना चाहते थे। जबकि अंग्रेज़ तो पहले से ही सिखों से लड़ने का बहाना तलाश रहे थे। ऐसी स्थिति में 1845 ई. प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध के कई कारण थे।

  1. अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति - यदि भारत में अंग्रेजों के व्यापारी के रूप में आने से लेकर उनके भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने तक के इतिहास पर नजर डाली जाए तो हम इस नतीजे पर पहुंचते है कि उन्होंने भारत की राजनीतिक कमजोरी, देश में फैली हुई गड़बड़ी और अराजकता, युद्धों द्वारा बनाई गई स्थिति का लाभ उठाकर विभिन्न राज्यों पर अधिकार कर लिया। 1818 ई. में, ब्रिटिश भारत में एक सर्व-उच्च शक्ति (Paramount Power) बन गए। उन्होंने कई स्वदेशी राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया। 1843 ई. में उन्होंने सिंध पर कब्जा कर लिया। पंजाब को छोड़कर बाकी भारत के सभी क्षेत्र या तो उनके अधिकार में थे और या तो छोटे राज्य बाकी बचे थे, वे उनकी अधीनता स्वीकार करते थे। पंजाब का स्वतंत्र सिख राज्य उनकी आँखों में रड़कता था। इसलिए इस को अपने साम्राज्य में मिलाने के लिए अंग्रेजों ने उच्च-अधिकारी कोशिश करने लगें। प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध का यह मूल कारण था।
  2. पंजाब में अराजकता और गड़बड़ी - जून, 1839 ई. में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद पंजाब में गड़बड़ी और अराजकता फैल गई। उनके वंशज खड़क सिंह, नौनिहाल सिंह, शेर सिंह, दलीप सिंह और महारानी जिंदा में से कोई भी इतना योग्य नहीं था जो कि उनके साम्राज्य को व्यवस्थित रख सकता। सिंहासन के लिए युद्ध, षड्यंत्र और हाथापाई शुरू हो गई। उच्च सरदार और उच्च अधिकारी इन षड्यंत्रों में भाग लेने लगें। कई सरदारों ने तो अंग्रेजों के साथ मिल गए। इसका परिणाम यह हुआ कि महाराजा का शासन राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक दृष्टि से बहुत कमजोर हो गया। इस मौके की तलाश में अंग्रेज पहले से थे। मैक्कॉनटन (Macnaughton) ने गवर्नर जनरल ऑकलैंड को काबूल से यह संदेश भेजा कि पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया जाए और पेशावर का प्रदेश अफगानिस्तान को दे दिया जाए। लुधियाना के अंग्रेजी एजेंट ने 12000 ब्रिटिश सैनिकों के साथ लाहौर दरबार पर हमला करने की पेशकश की। कलकत्ता के सरकारी पत्रों में भी पंजाब पर कब्ज़ा करने की योजनाओं का उल्लेख मिलता है। 1838 ई. में ओसबोर्न (Osborne) ने कहा था कि रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेजों का पहला काम होगा पंजाब पर कब्जा (Annexation) करना। इन सभी तथ्यों से पंजाब के ख़िलाफ़ अंग्रेजों की साजिशों और बुरे इरादों का पता लगता है।
  3. रणजीत सिंह के राज्य को घेरने की ब्रिटिश योजना - महाराज रणजीत सिंह के जीवनकाल में उनकी शक्ति से डरते हुए, अंग्रेजों ने उनके राज्य के खिलाफ कोई सैनिक कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं की, लेकिन अमृतसर की संधि (1809), त्रिपक्षीय संधि (1838), बाद में लुधियाना और फिरोजपुर में ब्रिटिश सैनिकों का इकट्ठा होना, सिंध पर अंग्रेजों का अधिकार (1843) और अफ़ग़ानिस्तान में अपने दोस्त (शाहशुजा) को राज्य गद्दी पर बिराजमान करना आदि कुछ ऐसे काम थे जिन्होंने यह बात स्पष्ट हो गई थी कि अंग्रेजों महाराजा के राज्य को चारों तरफ से घेर रहे थे। सिख शासक सरदार और उच्च-अधिकारी यह महसूस करने लगे कि उनके राज्य चारों तरफ से शिकंजा कसा जा रहा था। किसी भी समय पंजाब अंग्रेजों की भूख का शिकार हो सकता था। इसलिए सिख भी उत्तेजित होने लगें। सिखों और अंग्रेजों के बीच उतेजना और तनाव का यह माहौल भी प्रथम सिख युद्ध का एक महत्वपूर्ण कारक बना।
  4. अफगानिस्तान में अंग्रेजों की निराशाजनक असफलता विफलता - त्रिपक्षीय संधि (1838 ई.) को अमली रूप देने के लिए अंग्रेजों ने अफगानिस्तान पर हमला करके अपने दोस्त शाहशुजा को गद्दी पर बैठा दिया, पर वो अयोग्य सिंध हुए। उसके खिलाफ बहुत जबरदस्त विद्रोह हुआ। उस को हरा दिया गया। अंग्रेजों को इस निराशाजनक स्थिति को कबूल करना पड़ा। अफगान युद्ध में असफल होकर वापस आ रही 16000 ब्रिटिश सैनिकों पर अफगानों ने हमला कर दिया। इसमें से केवल एक व्यक्ति भारत लौटा और इस विनाश की कहानी सुनाई। अंग्रेज सोचते थे कि सिखों ने अफगान युद्ध में उनकी उचित सहायता नहीं की। दूसरा, वे अफगानिस्तान की विफलता की कमी को सिखों के खिलाफ युद्ध में सफलता प्राप्त करके पूरा करना चाहते थे। दूसरी तरफ सिखों को अंग्रेजों की सैनिक कमजोरी का पता चला गया था। यह तथ्य स्पष्ट हो गया कि बहादुरी से लड़ने से अंग्रेजों को भी हराया जा सकता था। इस बात ने सिखों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए उकसाया।
  5. सिंध को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाना - महाराजा रणजीत सिंह सिंध पर कब्जा करना चाहता था, लेकिन 1832 ई. में अंग्रेजों ने सिंध के अमीरों के साथ एक व्यापार संधि करके उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 1843 ई. में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड एलेनबरा ने सिंध को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल करने का ऐलान कर दिया। सिखों को यह डर लगने लगा कि अगला नंबर पंजाब होगा। सिंध पर अंग्रेजों के कब्जे से सिख-अंग्रेज़ संबंधों में बहुत कड़वाहट आ गई।
  6. कैथल का मामला - सतलुज नदी के दक्षिणी भाग में कैथल के राज्य पर भाई उदय सिंह का कब्जा था। उनकी मृत्यु के बाद, राज्य को अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य में मिला लिया। इस कारण ने सिखों को डरा दिया।
  7. सुचेत सिंह के ख़ज़ाने का मामला - राजा ध्यान सिंह (महाराजा रणजीत सिंह का प्रधानमंत्री) का भाई सुचेत सिंह अपनी मृत्यु के बाद (1844 ई. में) बहुत सारा धन (15 लाख रुपये की कीमत का) फिरोजपुर में छोड़ गया। क्योंकि सुचेत सिंह निःसंतान थे, इस लिए उस जायदाद पर लाहौर दरबार अपना अधिकार समझता था, लेकिन अंग्रेजों ने यह खज़ाना उसके हवाले करने में टाल-मटोल करना शुरू कर दिया। इस घटना से सिखों का अंग्रेजों के प्रति संदेह बढ़ने लगा। अंग्रेज़ हर बात में अपनी मनमानी करने लगें।
  8. अंग्रेजों द्वारा युद्ध की तैयारी - रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ धीरे-धीरे, लेकिन लगातार युद्ध की तैयारी करने लगे। 1833 ई. में उन्होंने लुधियाना में सेना रख लिया और 1835 ई. में इस सेना की संख्या को बहुत बढ़ा दिया। 1835 ई. फिरोजपुर पर कब्जा कर लिया और इसके तीन साल बाद यहां एक सैन्य अड्डा स्थापित किया। 1842 ई. में उन्होंने अंबाला, मेरन, दिल्ली, सम्बाथू, कसौली और डगशाई में बड़ी संख्या में सैनिकों को इकट्ठा किया। एलेनब्रा के समय में लुधियाना, फिरोजपुर, अंबाला और मेरठ में ब्रिटिश सैनिकों की संख्या 17,612 थी। जबकि हार्डिंग के समय में यह संख्या बढ़कर 40,523 हो गई। इसी तरह तोपों की संख्या 66 से बढ़कर 94 हो गई। सतलज नदी पर नांव का पुल बनाने के लिए बॉम्बे में 70 नावें बनाई गई। अंग्रेजों की ये सैन्य तैयारी सिखों को भयभीत करने लगीं। उनके अंग्रेजों से संबंध बहुत कड़वाहट भरे हो गए।
  9. अंग्रेजों के षड्यंत्र - अंग्रेजों ने पंजाब के शासन में अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। उन्हें डोगरा सरदार-राजा ध्यान सिंह और गुलाब सिंह, एविटाइल और वैंतूरा को उकसाना शुरू कर दिया। वैंतूरा को उन्होंने अपना सीक्रेट एजेंट बना लिया था। इसी तरह लाल सिंह और तेज सिंह को भी अंग्रेजों ने अपने साथ मिला लिया था। ये दो सिख सरदारों के विश्वासघात के कारण ही पहला एंग्लो सिख युद्ध छिड़ गया था और यह उनके विश्वासघात के कारण ही इस युद्ध में सिखों की हार हुई। अंग्रेजों की ये सारी साजिशें लोगों से छिपी नहीं रह सकीं।
  10. एलिनबरा की पंजाब पर कब्ज़ा करने की इच्छा - भारत के ब्रिटिश गवर्नर जनरल एलिनबरा (Ellenborough, 1842-44) की सिख राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने की तीव्र इच्छा थी। उसके शासनकाल में सिंध पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया (1843 ई. में)। 1844 ई. में उसने ड्यूक ऑफ वेलिंगटन (Duke of Wellington) को 9 मई, 1844 ई. में लिखा कि नवंबर में लिखा था। 1845 ई. तब तक ब्रिटिश सेना सिखों के साथ युद्ध लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाएगी। गवर्नर जनरल बनने से ही वो यह सैनिक तैयारीयां करता आ रहा था।
  11. हार्डिंग का गवर्नर जनरल बनना - एलिनबरा के बाद 1844 ई. में लॉर्ड हार्डिंग भारत का गवर्नर जनरल (1844-1848 ई.) बनकर आया। वह विस्तारवादी नीति के समर्थक था। उसने प्रायद्वीपीय युद्ध और वाटरलू की लड़ाई में फ्रांस के शासक नेपोलियन को हराने में अहम भूमिका निभाई थी। एक सैनापति को गवर्नर जनरल बनाने का अर्थ था - सिखों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई।
  12. मेज़र ब्राडफ़ुट का सिख विरोधी द्रष्टिकोन - 1844 ई. में नियुक्त हुआ लुधियाना का एक ब्रिटिश एजेंट मेज़र ब्राडफुट अहंकारी था और सिख विरोधी द्रष्टिकोन रखता था। उसने घोषणा की थी कि सतलज नदी के दक्षिण में स्थित लाहौर दरबार के क्षेत्र अंग्रेजों की शरण में है। (1809 ई. में इन प्रदेशों पर महाराजा के अधिकार को मान्यता दे दी गई थी)। अब ब्राडफ़ुट के विचार से गवर्नर जनरल ने सहमति जाहिर की। मार्च, 1845 ई. में लाहौर दरबार के भूमि कर विभाग का एक उच्च अधिकारी लाल सिंह अदलती सतलज के इस पार के क्षेत्र में आकर महाराजा के के अधीन क्षेत्रों से कर एकत्र करना चाहते थे। ब्राडफुट ने उसको वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया और उसका पीछा करके, उसके कुछ साथियों को कैदी बना लिया। उसने गोली चलाने का भी आदेश दे दिया। जिस के कारण एक सिख की मौत हो गई। कैंमपबैल (Campbell) के अनुसार, इस अवसर चलाई गई गोली, पहले सिख युद्ध का पहला फायर था।
  13. लाल सिंह, तेजा सिंह और महारानी जिंदा द्वारा सिख सैनिकों को भड़काना - महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद राजमी साड़ियों के कारण खालसा सेना बहुत शक्तिशाली हो गई थी। लाहौर दरबार का प्रधानमंत्री लाल सिंह (सितंबर, 1845 ई. में वो प्रधानमंत्री बना) और सेनापति तेज सिंह अंग्रेजों के साथ मिला हुआ थे। वे अंग्रेजों को ऐसा मौका देना चाहते थे कि उन्हें सिखों के खिलाफ हमला करने का बहाना मिल जाए। उन्होंने और महारानी जिंदा ने सिख सेना को सतलज नदी को पार करने के लिए भड़काया। इसके पीछे दो उद्देश्य थे। एक तो युद्ध में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ने से खालसा सेना कमज़ोर हो जाएंगी और उनको (लाल सिंह, तेजा सिंह और महारानी जिंदा को) राहत की सांस लेने नसीब हो जाएगा। दूसरा अगर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ सिख सेना जीत जाती है तो इससे सिखों में तेजा सिंह, लाल सिंह और महारानी जिंदा की लोकप्रियता बढ़ जाएगी।
  14. 17 नवंबर, 1845 ई. का एतिहासिक फैसला - अंग्रेजों के हमले का संदेह और इस सूचना ने टुंडा लाट (Tunda Lat), या लॉर्ड हार्डिंग, सेनापति गफ़ (Gough) की मदद के लिए खुद आ रहा था, तो सिखों में खलबली मच गई। सिख सरदारों ने अपने निजी मतभेदों को भूल दिया और संगठित होने लगें। लोक मंदिरों, गुरुद्वारों और मस्जिदों में जाने के बजाय, महाराजा रणजीत सिंह की समाध पर प्रेरणा लेने जाने लगें। खालसा सेना के पंच महारानी जिंदा के पास युद्ध लड़ने की अनुमति प्राप्त करने गए। 17 नवंबर, 1845 ई. में हुई ऐतिहासिक बैठक में सतलुज नदी को पार करने और अंग्रेजों की हमलावर नीति का विरोध करने का फैसला किया गया। सिखों की सात डिवीजनों (seven divisions) ने रोपड़, लुधियाना, हरी के पतन, फिरोजपुर और सिंध के निकटवर्ती क्षेत्र की ओर बढ़ना शुरू कर दिया। हर डिवीजन में 8000 से 12,000 तक सैनिक थे। ब्रिटिश एजेंट के माध्यम से सिखों की इन सैन्य गतिविधियों का कारण पूछे जाने पर उसको इसका उत्तर मिला कि यह अंग्रेजों की सैन्य तैयारियों की प्रतिक्रिया थी। 3 दिसंबर, 1845 ई. को ब्रिटिश एजेंट ने अपना पासपोर्ट लाहौर दरबार के एक प्रतिनिधि को सौंप दिया। इस प्रकार अंग्रेजों और सिखों के बीच कूटनीति संबंध टूट गए।
  15. युद्ध की घोषणा - लाल सिंह और तेज सिंह के नेतृत्व में 11 दिसंबर, 1845 ई. को सिख सेना ने हरि के पतन के पास सतलज नदी को पार किया। इस से दो दिन बाद (13 दिसंबर, 1845 ई.) गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने सिखों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस प्रकार प्रथम अंग्रेज - सिख युद्ध शुरू हुआ। उसने अपने घोषणा पत्र में सच्चा बनने का का ढोंग किया। उसने यह कहा कि अंग्रेजों की सैन्य तैयारी केवल बचाओ के तौर पर की गई थी। उसका कहना था कि अंग्रेजों ने बहुत संयम से काम लिया था। उनकी सिखों के साथ दोस्ती बनाए रखने की इच्छा के बावजूद सिख सेना ने अंग्रेजी क्षेत्र पर हमला किया था। उन्होंने मालवा के सिख शासकों को अंग्रेजों और उनके (मालवा के शासकों के) सांझे दुश्मन या लाहौर दरबार के खिलाफ सैन्य समर्थन देने का भरोसा दिलाया। वास्तव में यह घोषणा पत्र झूठ का एक पुतला था और अंग्रेजों द्वारा युद्ध शुरू करने की साजिश को छुपाने के लिए किया गया था। उनकी नीयत (इरादा) और पंजाब पर कब्ज़ा करने की इच्छा सभी पंजाबी पहले से जानते थे।
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