संगत और लंगर प्रथा क्या है?

संगत और लंगर प्रथा - अपने जीवनकाल के दौरान, गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म के दो बुनियादी संस्थानों - संगत और लंगर की स्थापना करके उन्होंने पंथ को एक शक्तिशाली नींव प्रदान की, जिस पर इसका सुंदर भवन बना। इस सम्बन्ध में डॉ. जी. एस. ढिल्लों ने अपनी पुस्तक में पेज 6 पर लिखा है - “गुरु नानक द्वारा स्थापित दो संस्थाएं - संगत और पंगत, उनके द्वारा प्रचारित एकता और मानवतावादी समानता के आदर्शो के जीवंत उदाहरण है।” यह संस्थान गुरु साहिब की शिक्षाओं का आधार है।

इनके कारण सिख भाईचारे, सिख धर्म का विकास, ईश्वर की एकता और मानवीय समानता के सिद्धांतों को मज़बूत किया गया है। इन दोनों संगठनों ने अनगिनत लोगों को सिख धर्म के साथ जोड़ा है, उनमें भाईचारे की भावना विकसित की, उन्हें प्रभु की भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी, जाति प्रथा को गहरी चोट पहुंचाई और उनमें सामाजिक सेवा और कार सेवा की भावना पैदा की। अब हम संगत और लंगर की संस्थाओं का अलग-अलग वर्णन करते है।

संगत प्रथा क्या है?

संगत प्रथा क्या है?

‘संगत’ शब्द का अर्थ है सच्चे-सुच्चे और साधु स्वभाव के लोगों का समूह। सिख धर्म के संदर्भ में संगत का मतलब है, गुरु के शिष्यों या उनकी शिक्षाओं के प्रति विश्वास और भक्ति रखने वाले लोगों की धार्मिक सभा जिस में गुरु के मार्गदर्शन में प्रभु की प्रशंसा और गुणगान के शब्द गाए जाते है, प्रभु का कीर्तन किया जाता है और उसके नाम का श्रद्धा पूर्वक जाप किया जाता है।

यह सिखों का एक ऐसा धार्मिक इक्कठ होता है जिसमें गुरु के सिख गुरबानी का उच्चारण करते हुए खुद को भगवान को समर्पित करते है। इस धार्मिक सभा का वातावरण भक्ति भावना से परिपूर्ण होता है। गुरु नानक देव जी ने अपने विभिन्न यत्रों के दौरान विभिन्न स्थानों पर सिख संगत की स्थापना की। उन तीर्थस्थलों से लौटने के बाद भी, उन स्थानों पर गुरु साहिब के प्रमुख सिख और श्रद्धालु सिख संगत में आने वाले लोगों को गुरु बानी का पाठ सुनाते थे।

वास्तव में, ‘संगत’ का दुसरा नाम सिख भाईचारा है। गुरु साहिब के विचारों के अनुसार, संगत नेक और गुणी लोगों की सभा है जिसमें केवल एक भगवान के नाम का जाप किया जाता है। गुरु नानक देव जी द्वारा स्थापित संगत नामक संस्था को बाद में सिख धर्म में इतना महत्व दिया गया था कि उनके सभी उत्तराधिकारी गुरु इस संस्था को आगे विकसित किया और यह संस्था सिख धर्म के दूर-दूर तक फैलने का एक प्रमुख कारण बनी। बाद के संगत के लिए संत संगत और साध संगत आदि शब्दों का इस्तेमाल किया गया।

संगत की मुख्य विशेषता यह थी कि उच्च-नीच, ग़रीब, अमीर, सभी जातियों, जाति भेद और वर्ग भेद और धर्म भेद को त्याग कर एक पवित्र भाईचारे के रूप में इकट्ठे होते थे। एक ही जगह पर बैठकर उन्होंने भगवान का गुनगान करते थे और धार्मिक मामलों पर चर्चा करते थे। संगत में आने वाले स्त्री-पुरुष एक ही पंक्ति में बैठ कर भोजन (लंगर) करते थे। उनमें आपसी भाईचारे, आपसी प्रेम और भक्ति की भावना का संचार हुआ। उनके मन में मानवीय समानता और एक ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना प्रबल हो गई। गुरु की शिक्षाओं और प्रमुख सिख भक्तों की धार्मिक चर्चाओं के कारण उनके अंधविश्वासों, रिवाजों और पुरोहितवाद की बुराइयाँ समाप्त होने लगीं।

वह पवित्र, सरल और पाप रहित जीवन जीने की ओर प्रेरित हुए। गुरु अर्जन देव और गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के साथ सिख धर्म में बलिदान की भावना पैदा हुई। गुरु हरगोबिंद साहिब के समय में सिख संगत ने मीरी और पीरी के आदर्श को अपनाया। गुरु गोविंद सिंह ने खालसा की स्थापना करके संगत को ओर भी शक्तिशाली बना दिया। क्योंकि वे सिख संगत और पंज प्यारों को अपने से श्रेष्ठ मानने लगें। बाद में सिख संगत (सरबत खालसा) के निर्णय को ‘गुरुमता’ कहा जाने लगा।

गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासीयों के बाद, सथायी रूप से करतारपुर में निवास करने लगें। उन्होंने वहां पहला महत्वपूर्ण संगत स्थापित किया था। अन्य स्थानों पर जैसे कि उत्तर पंजाब में भाई लालो, दक्षिण पश्चिम में सज्जन, बनारस में गोपाल दास, जगन्नाथ पुरी में कलियुग और बिहार में सालिसराय और श्रीलंका में शिवनाभ की अगुवाई में संगत के रूप में गुरु साहिब के शिष्य एकत्रित होते थे और भगवान के गुणगान करते थे, नाम जपते थे और भक्ति के साथ गुरबानी गाते थे। भाई गुरदास के अनुसार, संगत में ईश्वर और गुरु का वास होता था। यहां संगत की बैठक होती थी, वहीं भवनों का निर्माण किया जाने लगा। यह भवन ‘धर्मशाला’ और बाद में ‘गुरुद्वारा’ कहलाने लगें।

संगत का महत्व - गुरु नानक देव जी द्वारा ‘संगत’ की स्थापना और उनके उत्तराधिकारी गुरुओं द्वारा इसका आगे विस्तार का सिख धर्म के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है।

  1. संगत ने गुरु नानक देव के अनुयायियों को संगठित करने और उनमें भाईचारे की भावना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  2. क्योंकि ‘संगत’ में विशेष प्रकार की धार्मिक प्रथाओं को अपनाया जाता था, उनमें न तो ब्राह्मणों और मुस्लिम मुल्लाओं के अनुष्ठान थे, इनमें एक प्रभु की भक्ति और उनके नाम के जाप और गुरु साहिब की शिक्षाओं को महत्व दिया जाता था, गुरबानी का पाठ किया जाता था इस लिए सिख संगत का अपना एक महत्वपूर्ण रूप था। जिसके कारण सिख धर्म की अपनी अलग पहचान और होद के रूप में विकास हुआ। सिख संगत अन्य धार्मिक समारोहों और सभाओं से अलग था। इस लिए भाईचारे, आपसी प्रेम, श्रम और कार सेवा की अपनी भावना थी जिसमें जाति प्रथा और अन्य सामाजिक और वर्ग के मतभेदों के लिए कोई जगह नहीं थी।
  3. सिख संगत अच्छे, ईमानदार और पवित्र स्वभाव के धार्मिक लोगों का एक धार्मिक जमावड़ा था। इसमें शामिल होने वाले लोग मुख्य रूप से आध्यात्मिकता और इश्वर की भक्ति से प्रेरित होते थे। उनका जीवन पवित्र और व्यवहार पाप रहित था। इसलिए उनकी संगत से दूसरे लोगों को अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरणा मिलती थी।
  4. सिख संगत की संस्था ने पंथ के विकास और दूर-दूर तक इसके प्रचार-प्रसार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुरुओं के अलावा मंजीदार, मसंद और संगतों के माध्यम से लोगों में सिख धर्म का प्रचार करते थे और लोगों को गुरुओं द्वारा बताए गए रस्ते पर चलने की शिक्षा देते थे। इस तरह सिख धर्म भी एक मिशनरी धर्म के रूप में विकसित होने लगा।
  5. संगत के साथ ही बाद में मंजी प्रथा, मसंद प्रथा, खालसा और सरबत खालसा की स्थापना और इन संस्थानों के विकास और संगठन में सहायता मिली। इन सभी संस्थानों का आधार संगत ही है। संगत में धीरे-धीरे विशेष प्रकार की धार्मिक प्रथाओं और धार्मिक परंपराओं को अपनाया जाने लगा। इसके कारण ही आधुनिक सिख मर्यादाओं का धीरे-धीरे विकास होने लगा। ये निश्चित मर्यादाओं को बड़े आदर-सत्कार से आजकल गुरुद्वारों और धार्मिक त्योहारों, आदि के पाठों और भोगों के समय पर संपन्न की जाती है।
  6. क्योंकि संगत को एक पवित्र संस्था माना जाता है। सिखों में ऐसी दृढ़ मान्यता है कि संगत में गुरु या ईश्वर का वास होता है। इन फैसलों को गुरुमता (सरबत खालसा के सम्मेलन में गुरु ग्रंथ साहिब की मौजूदगी में लिया गया फैसला) समझा जाता है और सभी सिखों को मानना जरूरी होता है। क्योंकि संगत में सभी लोगों को समान माना जाता है, उन्हें एक ही पंगत में बैठकर लंगर खाना होता है, इसलिए उनके फैसलों में लोकतंत्र की विशेषता होती है, इसलिए सिखों के बीच लोकतांत्रिक भावनाओं को फैलाने के लिए संगत नामक संगठन की भूमिका अनदेखी नहीं की जा सकती।
  7. 'संगत' की बैठकें जिन भवनों में होती थी, उन्हें पहले धर्मशाला कहा जाता था। लेकिन बाद में उन्हें गुरुद्वार कहा जाने लगा। आज भारत और विदेशों में कई गुरुद्वारे मिलते है। उनकी पृष्ठभूमि में भी संगत का योगदान है। आज सिख धर्म का जो रूप दिखाई देता है, वो इस पवित्र संस्था की ही देन है।
  8. खालसा की स्थापना करके गुरु गोबिंद सिंह जी ने संगत को एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण रूप प्रदान किया है। इस में सामिल होने वाले लोग पांच कक्के धारण करने और एक विशेष प्रकार की धार्मिक मर्यादाओं का पालन करने से अलग ही पहचान है। उनमें मानवीय समानता, एक ईश्वर के प्रति विश्वास और गुरु साहिब के लिए श्रद्धा की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। निश्चित रूप से संगत सिख धर्म का केंद्र बिंदु और आधार है। चारों ओर सिख समाज इस तरफ़ आकर्षित होता है। ‘संगत’ सिख समाज का दूसरा नाम है।

लंगर प्रथा क्या है?

संगत के अलावा, ‘लंगर’ एक ओर महत्वपूर्ण संस्थान है जो सिख धर्म का आधार है। संगत और लंगर नामक संस्थान एक दूसरे की पूरक और सिख धर्म की केंद्रीय संस्थान है। गुरु नानक देव जी ने इन दोनों संस्थानों की स्थापना की और उनके उत्तराधिकारी गुरुओं ने इनका पोषित और विकसित किया था। ‘संगत’ की तरह ‘लंगर’ भी एक ऐसा संगठन है जो सिख धर्म के मूल सिद्धांतों का प्रति रूप है।

लंगर प्रथा सिख धर्म के भाईचारे, मानवीय समानता, सेवा की भावना और गुरु नानक देव जी के किरत करण, नाम जपना और वंड छकना के सिद्धांत के व्यावहारिक रूप प्रदान करतीं है। प्राचीन काल से भारत में धार्मिक प्रंपरा रही है कि हवन-यज्ञ और विशेष धार्मिक त्योहारों में शामिल होने वालों को भोजन कराया जाता था। लेकिन गुरु साहिब ने इस प्रंपरा को सिख पंथ का एक आधारभूत और आवश्यक हिस्सा बना दिया और इस प्रंपरा के महत्व को बढ़ा दिया।

‘लंगर’ का अर्थ है सिखों का धार्मिक जमावड़ा (इक्कठ) के समय उनको बिना कीमत वसूल किए भोजन देने की व्यवस्था। लेकिन इस व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि भोजन करते समय उनको एक ही पंक्ति में बिठा कर लंगर की सभी सामग्री - अनाज, दूध, चीनी, फल, सब्जियाँ, दालें आदि की प्राप्ति गुरु भक्तों द्वारा अपनी इच्छा से दीं जाने वाली भेंट द्वारा की जाती थी। लंगर के लिए अपनी इच्छा से अनाज और अन्न सामग्री देना एक पवित्र धार्मिक काम समझा जाता था।

जो व्यक्ति या भक्त पैसे या भोजन आदि देने में असमर्थ होते थे, वे भोजन तैयार करना, भोजन परोसना, बर्तन साफ करना, संगत को बैठाना आदि का काम करके धर्म लाभ प्राप्त करते थे। भोजन करने के समय उच्च और निम्न जातियां, गरीब और अमीर, महिलाएं और पुरुष, राजा और रंक एक ही पंक्ति में बैठते थे। यही लंगर प्रथा का मानवीय पहलू था। जिस से व्यवहारिक रूप से जात-पात की प्रथा पर गहरा घाव दिया गया था।

गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा की बुराइयों का केवल उद्देश्य में ही खंडन किया बल्कि लंगर की प्रथा चला कर व्यवहारिक रूप से इस उपर वार दिया। लंगर की संस्था का महत्व बताते हुए। डॉ. हरि राम गुप्ता लिखते है- “इस से सिखों में अनुशासन, सेवा की भावना और ऐसी इच्छा पैदा हुई ताकि वह धर्म और मानवता के लिए कुछ दान दें सकें। इसने (लंगर ने) लोगों में भाईचारे और समानता की भावना को पैदा किया और विकसित किया। लंगर सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों रूपों में हमें सच्चे सिख धर्म की झलक दिखाई है।” लंगर की रसोई में, पुरुष और महिलाएं इकठ्ठे काम करते थे, भोजन करते थे, उनमें किसी का जाति या समाजिक भेदभाव नहीं था। डॉ. हरि राम गुप्ता के अनुसार, “लंगर समानता और भाईचारे का प्रतीक बन गया। यह एक शुद्ध धर्मनिरपेक्षता और सामाजिकता थी।”

लंगर के लिए अंग्रेजी में ‘Community Lunch’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब है ‘प्रतिभोज’ या ‘सहिभोज’ के रूप में लिया जाता है। वास्तव में लंगर प्रीतभेज या सहिभोज मात्र नहीं था। इस के साथ धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई है। लंगर को गुरु सिख गुरु या परमात्मा का प्रसाद या कृपा मान कर इसका आनंद लेते है। लंगर के लिए कुछ भेंट स्वरूप देना या इस के बनाने और प्रोसने में कोई सेवा करना और इसको छकना, एक पवित्र और धार्मिक कर्तव्य माना जाता है।

गुरु नानक देव जी ने करतारपुर साहिब अपने निवास स्थान या धर्म स्थान में संगत में आने वाले लोगों को यह आदेश दिया गया था कि वह लंगर के लिए कुछ भेंट देना और वहां आने वाले सभी लोग उस लंगर को खाकर ही जाए। उनके बाद, गुरु अंगद देव जी ने इस संस्था को विकसित किया। उन्होंने अपना प्रमुख दफ्तर खडूर साहिब में गुरु का लंगर जारी रखा। उनकी धर्मपत्नी बीबी खीरी खुद लंगर तैयार करती थी और परोसती थी। लंगर में खीर परोसी जाती थी।

गुरु अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब में इस प्रथा को जारी ही नहीं रखा बल्कि इस को सिख धर्म की एक स्थायी संस्था बना दिया। उन्होंने यह आदेश दिया कि उनसे मिलने से पहले, सभी को पहले लंगर खाना होगा ताकि उनका अहंकार दूर हो जाए और वह अपने से कम हैसियत के लोगों के साथ एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन खाकर मानवीय समानता और भाईचारे की भावना से प्रभावित हो। मुगल सम्राट अकबर ने गुरु साहिब से मिलने से पहले लंगर खाया था और वह इस व्यवस्था से बहुत प्रभावित हुआ था। तभी उन्होंने लंगर के लिए कई गाँवों को दान में देने की पेशकश की थी।

लेकिन गुरु अमर दास जी ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि लंगर लोगों की संस्था है। इस लिए इस के खर्च को लोगों द्वारा अपनी इच्छा से दीं गई भेंटों से ही चलाया जाएगा। इस में सरकारी संरक्षण को गुरु साहिब ने स्वीकार नहीं किया। गुरु साहिब के समय लंगर में कराह-प्रसाद देने की प्रथा चल पड़ी। गुरु राम दास जी, गुरु अर्जन देव जी और गुरु हरगोबिंद जी ने अमृतसर में इस प्रथा को बड़े उत्साह से चलाया। गुरु हरगोबिंद जी के समय उनके पुत्र बाबा अटल लंगर इंचार्ज थे। वह बड़ी श्रद्धा से लंगर परोसते थे। इस लिए यह कहावत प्रसिद्ध है-

ਬਾਬਾ ਅਟਲ

ਪੱਕੀਆਂ ਪਕਾਈਆਂ ਘੱਲ

गुरु हरगोबिंद जी ने कीरतपुर, गुरु हर राय जी ने नाहन, गुरु हर कृष्ण जी और गुरु गोविंद सिंह जी ने पांवटा साहिब, श्री आनंदपुर साहिब और श्री दमदमा साहिब में लंगर की संस्था का विस्तार किया। आज भी लंगर-सिख धर्म का एक स्थायी संस्थान बन गया है।

लंगर प्रथा का महत्व - लंगर व्यवस्था का सिख धर्म में अपना एक अलग महत्वपूर्ण स्थान है।

  1. लंगर (पंगत) और संगत सिख धर्म की मूल संस्थाएँ है, जिन पर इस मत के शानदार भवन का निर्माण हुआ। ये दो संस्थाएँ सिख धर्म की मुख्य शिक्षाएँ है - एक ईश्वर में विश्वास, प्रभु के नाम का सिमरन, श्रम और साझाकरण, मानव समानता और सेवा और भाईचारे को व्यावहारिक रूप देने वाली व्यवस्थाएं है।
  2. लंगर की संस्था ने सिख धर्म के विकास में विशेष योगदान दिया है। लंगर में सभी श्रेणियों और जातियां के लोग एक ही पंक्ति में बैठकर एक समान भोजन करते थे, इस से मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद-भाव समाप्त हुआ, और उनमें आपसी भाईचारे की भावना बढ़ी। लंगर तैयार करने, उसे परोसने और बर्तन साफ करने का काम वो सभ मिल कर करते थे। इससे उनका रिश्ता ओर गहरा हो गया। इसी कारण उनके भाईचारे और संगत बाढ़ा हुआ। बड़ी संख्या में गरीब, अनाथ और असहाय लोग बिना कुछ दिए पेंट भर भोजन मिलता था। इसलिए वह सिख धर्म के प्रति आकर्षित हुए। इस तरह सिख धर्म का बहुत प्रचार हुआ। सभी क्षेत्रों और जातियों के के लोग गुरु की शरण में आने लगें।
  3. लंगर की व्यवस्था ने सिखों में गुरु और धर्म के प्रति लगाव बढ़ा। लंगर के साथ-साथ वह गुरु के उपदेशों को सुनते थे, गुरबाणी का पाठ किया करते थे और नाम के जाप में डुब कर अपना जीवन सफल बनाते थे। इसलिए, इस संगठन के कारण, लोगों के मन सिख गुरुओं और सिख धर्म के प्रति श्रद्धा और सिख मत के एक इश्वर में उनका विश्वास दृढ़ था। उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ। अंधविश्वासों का अंधेरा छंटने लगा और उनमें नेक कमाई करने और इस नेक कमाई में से कुछ धन लंगर में भेंट देने की आदत बढ़ने लगी। वह अधिक दानशील, उदार और भाईचारे और समाजिक सेवा की तरफ़ केंद्रित हुए।
  4. लंगर और संगत की प्रथा ने सिखों को अपने एक अलग भाईचारे के रूप में विकसित होने का अवसर प्रदान करता है। उनका संगठन पारंपरिक हिंदू धर्म से अलग एक विशेष संगठन के रूप में उभरने लगा। इससे ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद को धक्का लगा। सिखों में अनुष्ठानों की जगह पर भर्ती और सेवा भावना को महत्व दिया जाने लगा। लंगर की प्रथा ने सिखों में उदारता, दानशीलता और त्याग की भावना को मजबूत किया और उन्हें अहंकार और अहंकार पर काबू पाने में सहायता की। वह ‘मुन्नुमुख’ से ‘गुरुमुख’ बनें।
  5. लंगर की प्रथा ने जाति प्रथा को गहरा आघात पहुँचाया क्योंकि लंगर में सभी जातियों और धर्मों के लोग एक ही पंक्ति में बैठकर एक समान भोजन करते थे।
  6. लंगर की संस्था के कारण अनेकों गरीब, अनाथ और असहाय लोगों को मुफ्त भोजन प्राप्त होता था। इस से उनके दुःख-दर्द कुछ कम हुई। गुरु सिखों के धन और भेंटों का सही उपयोग हो रहा था। यह भक्तों के लिए बहुत संतोष की बात थी। वह बढ़-चढ़ कर लंगर के लिए पैसे और अनाज भेंट करते थे।
दोस्तों आज इस पोस्ट में हमनें आपको संगत और लंगर प्रथा क्या है? के बारे में बताया है। उम्मीद है कि आपको यह पोस्ट पसंद आई होगी। अगर आपका कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बाक्स में पुछ सकते हो।

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