पंजाब के इतिहास के निर्माण में समस्याएं

पंजाब के इतिहास की रचना करने वाले इतिहासकारों को कई कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ा।

पंजाब के इतिहास के निर्माण में समस्याएं

  1. भारतीयों द्वारा इतिहास लेखन में रुचि न लेने के कारण आधुनिक इतिहासकारों के लिए, पंजाब ही नहीं बल्कि पूरे भारत के इतिहास की रचना करने में बहुत कठिनाईयां पैदा हुई। अलबरूनी (Alberuni) की राय है कि भारतीय क्रमबद्ध इतिहास लेखन पर कोई ध्यान नहीं देते। इसकी जगह पर वे कहानियाँ गढ़ने लग जाते है। इसलिए शुद्ध ऐतिहासिक सामग्री की कमी है। घटनाओं का विशेष तौर पर वर्णन न करके भारती उनका सामान्यकरण (Generalization) कर देते है। इस प्रकार इतिहास लेखन में कल्पना और मिथक का मिश्रण हो जाता है। धर्म, मिथक (Myth), दर्शन (Philosophy) और साहित्य का मिश्रण होने से ऐतिहासिक तथ्यों पर सच्चाई को उस मिश्रण में से बाहर निकालना बहुत मुश्किल हो जाता है।
  2. महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल (1799-1839) को छोड़ कर पंजाब की कोई अलग राजनीतिक अस्तित्व नहीं था। वह मुगल साम्राज्य का एक हिस्सा था। उनका स्वतंत्ररूप से इतिहास ही नहीं रचा गया। इस लिए मुगल साम्राज्य से संबंधित ऐतिहासिक ग्रंथों पर निर्भर रहना पड़ता है। ये ग्रंथ मुस्लिम दृष्टिकोण से लिखे गए थे और कभी-कभी ऐतिहासिक घटनाओं को यथार्थवादी रूप में पेश नहीं करते।
  3. पंजाब भारत की उत्तर पश्चिमी सीमा पर स्थित था। इसलिए प्राचीन काल से आधुनिक काल की शुरुआत तक, यह हमेशा विदेशी हमलों का शिकार रहा है। इन हमलावरों ने बहुत सारी उपयोगी इतिहासिक सामग्री को नष्ट कर दिया।
  4. पंजाब के इतिहास की रचना के लिए हम मुख्य रूप से सिखों के धार्मिक साहित्य पर निर्भर करते है। लेकिन इस संबंध में एक बात ध्यान देने योग्य है कि ऐसे साहित्य में भक्ति, श्रद्धा, भावनाओं (sentiments) और परंपराओं को ज्यादा महत्व दिया गया है। इनकी वजह से कुछ वास्तविक ऐतिहासिक तथ्य (facts) या तो नजरअंदाज कर दिये जातें है या फिर इन रचनाओं में धर्म, पौराणिक कथाओं (mythology) और इतिहास इस तरह से घुल मिल (mix) जाता है कि शुद्ध इतिहास को उस में खोजना मुश्किल हो जाता है।
  5. इतिहासकारों के सामने एक समस्या यह है कि सिख और मुस्लिम लेखक एक ही घटना या व्यक्ति के बारे में विभिन्न प्रकार के विचार प्रस्तुत करते है। उनमें सच्चाई को खोजना बहुत मुश्किल हो जाता है।
  6. मुस्लिम लेखकों की धार्मिक कट्टरता भी एक महत्वपूर्ण समस्या पेश करती है। यह लेखक या तो एक सिख धर्म प्रति दुश्मनी पर या फिर मुस्लिम शासकों को खुश करने के लिए राजनीतिक घटनाओं को तोड़ मरोड़ कर पेश करते है। इसलिए उनके द्वारा लिखे गए तथ्यों को ऐतिहासिक सत्य को स्वीकार करना कठिन है।
  7. गुरुकाल (1469-1708) के इतिहास के लिए हम मुख्य रूप से जन्म साखी साहित्य पर निर्भर करते है, लेकिन जनम सखियों के बारे में यह कहा जाता है कि इनमें कई चमत्कारी कहानियां जोड़ दी जाती है, जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। दूसरा इन जन्म सखियों में कई घटनाएँ और उनकी तारीखें एक बड़ा अंतर है। इसलिए यह महत्वपूर्ण स्रोत होते हुए भी एक इतिहासकार को जनम साखी साहित्य को बहुत जांच पड़ताल करके पढ़ना पड़ता है और इस में ऐतिहासिक सत्य को निकालना पड़ता है।
  8. सिख धर्म में समय-समय पर गुरुगद्दी के लिए झगड़े होते रहे है। गुरु अर्जन देव जी, गुरु हर राय जी और गुरु तेग बहादुर जी के समय क्रमवार प्रिथिया, राम राय और धीरमल आदि ने गुरु साहिब का विरोध किया। सिख गुरुओं के इन विरोधियों ने गुरुओं के प्रति अपनी ईर्ष्या के परिणामस्वरूप कई गलत बातें लिखी है। इन्हें ऐतिहासिक दृष्टि से लेखन की जांच करना भी इतिहासकारों के लिए एक समस्या बन गई है।
  9. 18 वीं शताब्दी के पहले आधे हिस्से (1700-1760) में पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता, अव्यवस्था और अशांति रहीं। मुगल साम्राज्य के पतन के साथ पंजाब और मुगल सम्राट की पकड़ ढीली हो गई। मुगल सूबेदारों ने सिखों पर बहुत अत्याचार किया। नादरशाह और अहमदशाह अब्दाली के हमलों ने स्थिति को ओर भी खराब कर दिया। सिखों ने खुद को मिसालों के रूप में गठित करना शुरू कर दिया। राजनीतिक अस्थिरता के ऐसे पर्यावरण में बहुत सारी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री नष्ट हो गई।
  10. 1947 ई. में भारत के विभाजन के कारण पश्चिम पंजाब और पंजाब की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र लाहौर पाकिस्तान में चला गया। पंजाब के इतिहास से संबंधित बहुत सामग्री विभाजन या लूटमार में नष्ट हो गई या फिर पाकिस्तान में रह गई। यह सामग्री अभी तक भी पंजाब के इतिहासकारों की पहुंच से बाहर है।
  11. 1920 ई. से पहले गुरुद्वारों पर महंतों का अधिकार था। जब उन्होंने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन के बाद शुरू वहाँ से निकाल दिया गया तो वह अपने साथ बहुत सारे धार्मिक ग्रंथ ले गए। इसे तरह कई सिख परिवारों जागीरदारों और राज्य परिवारों के पास पट्टे, प्रमाण पत्र, व्यक्तिगत पत्राचार, किताबें, लेख पत्र, वस्त्र, अस्त्र शस्त्र आदि है। यह सब हमें महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी प्रदान कर सकते है, लेकिन लोग जिनके पास यह सामग्री है, वे इसे इतिहासकारों को सौंपने के लिए सहमत नहीं है।
  12. हिंदुओं का पुरोहित वर्ग उस समय ज्यादा शिक्षित थे और लिखन का काम करता था क्योंकि सिख गुरुओं ने हिन्दूओं के कई पुराने हिंदू रीति-रिवाजों, मूर्तिपूजा, अवतारवाद और पुरोहितवाद का विरोध किया था। इस लिए पुजारी और ब्राह्मण वर्ग ने गुरुओं के बारे में या बहुत कम लिखा गया है और फिर ईष ईर्ष्या की भावना से प्रेरित होकर लिखा। इस लिए उनकी रचनाएं हमें निकोल तथ्य पेश नहीं करती।

उपर दी गई कई कठिनाइयों के बावजूद हमें कई ऐतिहासिक स्रोत प्राप्त हुए है जिनको आधार मानकर हम पंजाब के इतिहास की रचना कर सकते है। इनमें से मुख्य है - कई भाषाओं में लिखी गई इतिहासिक रचनाएं, सरकारी रिकॉर्ड, आपसी पत्राचार, सिक्के, हथियार, भवन, स्मारक और विभिन्न कला के नमूने जो कि हमें प्राप्त हुए है।

दोस्तों आज इस पोस्ट में हमनें आपको पंजाब के इतिहास के निर्माण में समस्याएं के बारे में बताया है। उम्मीद है कि आपको यह पोस्ट पसंद आई होगी। अगर आपका कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बाक्स में पुछ सकते हो।

एक टिप्पणी भेजें