गुरु तेग बहादुर जी की जीवनी

सिखों के नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब का नाम केवल सिख धर्म में नहीं, बल्कि पूरे भारत के इतिहास में अपना एक ऊँचा स्थान है। लोग उन्हें हिंद का चादर कहकर श्रद्धांजलि देते है। उनके गुरुकाल के समय का महत्व यह है कि उन्होंने सिख इतिहास की केंद्रीय धारा को भी शक्तिशाली बनाया। वह उनके पिता और पुत्र के बीच में एक नैतिक और ऐतिहासिक कड़ी थे। उन्होंने गुरु गोविंद सिंह जी की सफलताओं के लिए रास्ता दिखाया जिन्होंने सिख पंथ को नई एकता दी थी।

वे धर्म की स्वतंत्रता के सिद्धांत के लिए शहीद हुए थे। मानवता और मानवीय मूल्यों के उदात्त आदर्शों के लिए उनका आत्म-बलिदान सदियों तक लोगों को प्रेरित करता रहेगा। उनके जीवन का अध्ययन अपने आप में एक आध्यात्मिक अभ्यास है जो मनुष्य को मानसिक शांति भी देता है।

गुरु तेग बहादुर जी की जीवनी

गुरु तेग बहादुर जी का जन्म, पालन-पोषण और शिक्षा

गुरु तेग बहादुर का बचपन का नाम त्याग मल्ल था। तेग बहादुर नाम तो उन्हें 14 वर्ष की उम्र में मुगलों के साथ करतारपुर की स्थान पर हुए लड़ाई (1635 ई.) में बहादुरी दिखाने पर गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने रखा था। तेग बहादुर शब्द का अर्थ होता है तलवार का धनी या बहादुर। उनका जन्म 1 अप्रैल, 1621 ई. को अमृतसर में हुआ था। वह गुरु हरगोबिंद के पांच पुत्रों में सबसे छोटे थे।

उनकी माता का नाम नानकी था। माता-पिता से कोमलता, स्नेह, दया, निडरता, साहस और जुल्म के खिलाफ लड़ने के गुण मिले थे। उन्होंने कम उम्र में ही हथियार चलाना भी सीख लिया था। उन्होंने घुड़सवारी की भी अच्छी ट्रेनिंग ली थी। उन्होंने विभिन्न विषयों का अध्ययन किया - तर्क, दर्शन, रामायण, महाभारत, गीता, कुरान और उन्होंने सूफ़ी मत से सम्बंधित साहित्य का अध्ययन किया था।

गुरु तेग बहादुर जी का विवाह

उनका विवाह करतारपुर निवासी लाल चंद की बेटी गुजरी जी से हुआ था। विवाह के कई वर्षों के बाद, उनके घर में 1666 ई. में लड़के गोबिंद राय का जन्म लिया, जो बाद में दसवें गुरु गोबिंद सिंह बन गए।

बकाला में इश्वर ध्यान

गुरु साहिब ने अपने जीवन के लगभग 20 साल बकाला (1645-1666) में बिताए। वे लंबे समय तक एक छोटी गुफा में प्रभु भक्ति करते रहते थे। इन 20 वर्षों (1645-1664) के दौरान गुरु हरराय जी (1645-61) और गुरु हरकिशन जी (1661-64) गुरुगद्दी पर बिराजमान रहे।

गुरुगद्दी की प्राप्ति

1664 ई. में उनकी मृत्यु से पहले गुरु हरकिशन जी ने ये शब्द कहे थे - ‘बाबा बकाला’। इसका मतलब यह था कि वह उनके बाद बकाला में रह रहे, उनके बाबा (गुरदित्ता जी के सबसे छोटे भाई) गुरुगद्दी के उत्तराधिकारी होगें। क्योंकि गुरु साहिब ने बाबा बकाला शब्दों का उच्चारण किया था और किसी का खास नाम को नहीं लिया था, सोढ़ी परिवार के 22 पुरुषों ने खुद को गुरु गद्दी के उत्तराधिकारी कहना शुरू कर दिया। तो असली गुरु को खोजना बहुत मुश्किल हो गया।

सौभाग्य से माखन शाह लुबाना उन दिनों में गुरु साहिब को 500 मोहरें भेंट करने आया। एक बार उनका व्यापारी जहाज एक समुद्री तूफान में डूब रहा था, इसलिए वह गुरु के चरणों में 500 मोहरें भेंट मन्नत मांगी थी ताकि उसे सुरक्षित किया जा सके। अब वह अपनी मन्नत पूरी करने के लिए बाकला आया था।

वह हर पाखंडी गुरु के सामने जाते थे और दो-दो मुहरों भेंट चढ़ा कर उन्हें प्रणाम करते थे, लेकिन जब वे गुरु तेग बहादुर जी के आगे भी दो मोहरें भेंट किए तो फिर उन्होंने कहा कि तुमने मन्नत मांगी थी कि मैं 500 मुहरें चढ़ाऊंगा, लेकिन अब काम पूरा हो गया है तो 2 ही चढ़ा रहे हो, तो उसकी आँखें खुल गई। उसने खुशी से ऊँची आवाज़ में दोहराया, “गुरु लधो रे, गुरु लधो रे” इसका का अर्थ है गुरु मिल गया है, गुरु मिल गया है। इस प्रकार बाकी पाखंडी गुरुओं की दुकानदारी ख़त्म हो गई।

गुरु साहिब का विरोध

जैसा कि हम जानते है कि गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने अपने सबसे बड़े पुत्र धीर मल्ल के स्थान पर श्री हरि राय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। उसी समय से, धीर मॉल ने गुरु साहिब का विरोध करना शुरू कर दिया। उसने खुद को गुरु बनाकर लोगों को गुमराह कर रहा था। गुरु हरराय जी ने अपने सबसे बड़े पुत्र राम राय जिस ने औरंगजेब के डर से ‘आसा की वार’ के एक श्लोक की ग़लत व्याख्या कर दी थी, उसके स्थान पर अपने छोटे बेटे श्री हर किशन जी को गुरु के रूप में नियुक्त कर दिया था। इसलिए राम राय भी नाराज हो गए थे। धीर माल और राम राय कुछ स्वार्थी मसंदो के साथ मिलकर गुरु तेग बहादुर जी के खिलाफ साजिशें करनी शुरू कर दीं।

1665 ई. में गुरु तेग बहादुर साहिब हरमंदिर साहिब (अमृतसर) में नहाने के लिए गए। उन दिनों यह गुरु अर्जन के भाई पृथ्वी के वंशजों द्वारा भी कब्जा कर लिया गया था। उन्होंने गुरु साहिब को दरबार साहिब में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी। गुरु साहिब हरमंदिर साहिब के पास ही जिस स्थान पर कुछ समय के लिए रुके थे, अब इसे गुरुद्वारा “थडा साहिब या थम साहिब” के नाम से जाना जाता है। शिहां नाम के एक मसंद ने गुरु साहिब को गोली भी मारी और घायल कर दिया था।

उसके गुंडे साथीयों गुरु साहिब की संपत्ति को भी लूट लिया था, लेकिन गुरु साहिब के भक्तों (खासकर माखन शाह) ने धीर मॉल पर हमले के द्वारा गुरु साहिब की सारी संपत्ति फिर से हासिल कर ली थी और साथ ही उसने आदि ग्रंथ की एक पुरानी बीड़ (कांपी)(An old Manuscript of the Adi-Granth) भी हासिल कर ली‌। दया दिखाते हुए गुरु साहिब जी ने धीर मॉल और उसके अन्य साथियों को माफ़ कर दिया।

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