गुरु हर किशन साहिब जी की जीवनी (1661 - 64 ई.)

1661 ई. गुरु हरिराय जी की मृत्यु के बाद, उनके पांच वर्षीय पुत्र श्री हर किशन जी गुरुगद्दी पर बैठे। उनका जन्म 7 जुलाई 1656 ई. को कीरतपुर में हुआ था। उनकी माता का नाम सुलखनी था। छोटी उम्र में गुरु बन जाने के कारण उन्हें बालगुरु कहा जाता था। उनके बड़े भाई राम राय, धीर मॉल के मीणा संप्रदाय और कुछ स्वार्थी और धोखेबाजों के साथ मिलकर गुरु गद्दी पाने की कोशिश करने लगा।

गुरु हर किशन साहिब जी की जीवनी

जब उसकी यहां दाल नहीं गली, तो वह दिल्ली में औरंगजेब के पास गया और दावा किया कि गुरु गद्दी पर उसका अधिकार है। औरंगज़ेब ने मामले को तय करने के लिए गुरु हर किशन को दिल्ली बुलाया। दिल्ली में गुरु साहिब जी, उनकी माता सुलखनी जी और कुछ ओर सिख वहां राजा जय सिंह (राइसन के राजा) के बंगले में रुके।

औरंगज़ेब गुरु साहिब जी से बहुत प्रभावित हुए। इसलिए उसने उन्हें गुरु गद्दी के स्वामी मानने का फैसला किया। दिल्ली में रहने के दौरान, गुरु हर किशन साहिब चेचक से बीमार पड़ गए और गुरु जी स्वर्गवास हो गया। वह उस समय लगभग 7-8 साल के थे। मृत्यु से पहले उनके मुंह से ‘बाबा बकाला’ शब्द सामने आए।

इन शब्दों का मतलब था बकाला गाँव (अमृतसर के पास) में रहने वाले उनके बाबा या दादा जी उनके उत्तराधिकारी होंगे। बकाला में, कई लोग झूठें गुरु बन गए। आखिरकार मंखन शाह लुबाना के प्रयासों से, इन पाखंडी गुरुओं का भाड़ा टूट गया और असली गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी का सिख संगत को पता लग गया।

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