भक्ति आंदोलन क्या है?

भक्ति आंदोलन - मध्यकालीन भारत में हिंदू धर्म में एक शक्तिशाली धार्मिक सुधार आंदोलन का जन्म हुआ जिसे भक्ति लहर या भक्ति आंदोलन कहा जाता है। इसे यह नाम देने का मुख्य कारण यह था कि इस आंदोलन से जुड़े सभी संतों का कहना था कि भक्ति ही मोक्ष का सही मार्ग है। गुरु नानक को पंजाब में भक्ति आंदोलन का संस्थापक माना जाता है। वास्तव में, वे वैष्णव भक्ति से अलग संत धरा के एक प्रमुख अनुयायी थे। अब प्रश्न यह उठता है कि गुरु नानक की शिक्षाएँ अन्य वैष्णव भक्तों की शिक्षाओं के अनुरूप थीं कि उन दोनों में कोई मूलभूत अंतर था।

भक्ति आंदोलन क्या है?

वास्तव में, इस प्रश्न का उत्तर तभी मिलेगा जब हम मध्यकालीन भारत-व्यापी भक्ति आंदोलन के सरूप के बारे में अच्छी तरह से समझ पाएंगे। भक्ति आंदोलन के भक्तों की दो श्रेणियां थीं। एक वे भक्त थे जो अवतारवाद के सिद्धांत का पालन करते थे और राम और कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार मानकर उनकी मूर्ति बनाकर पूजा करते थे, यानी सरगुन भगती में विशवास रखते थे।  इसके लिए वैष्णव भक्ति शब्द का इस्तेमाल किया गया है।  इस श्रेणी में रामानुज, बलभाचार्य, चैत्य और रामानंद जैसे भक्त शामिल थे। दूसरी श्रेणी में भगत या संत थे जो निर्गुण भागती में विश्वास करते थे और भगवान को निरंकार मानते थे। वह अवतारवाद के सिद्धांत और मूर्तिपूजा के खिलाफ थे। भक्ति आंदोलन की इस परंपरा का नाम संत लहिर था।  गुरु नानक, कबीर, रविदास और नामदेव इस संत लहिर के प्रमुख नेता थे।

समानताएं

भागती आंदोलन की शिक्षाओं और गुरु नानक के उपदेशों और कई सिद्धांतों के बीच समानताएं थीं जैसे (i) भगती को भगवान की प्राप्ति का मुख्य मार्ग समझना, (ii) एक ईश्वर में विश्वास करना, (iii) जाति प्रथा का विरोध करना, (iv) ईश्वर प्राप्ति के लिए गुरु को महत्व देना (v) मानव जाति की एकता और विश्व भाईचारे की भावना, (vi) अच्छे कर्म और नैतिकता पर जोर देना और (vii) संस्कृत भाषा को पवित्र मानने से इन्कार करना आदि।

विभिन्नताएं

निस्संदेह गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ कई मायनों में भक्ति आंदोलन के अन्य भक्तों की बातो से मेल खाती हैं, लेकिन फिर भी एक धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से गुरु साहिब के विचार उनसे अलग और मौलिक थे।

(i) ईश्वर की एकता संबंधी गुरु साहिब के स्पष्ट और दृढ़ विचार थे। उनहोंने इस संबंध में डट कर कर कहा "साहिब मेरा एको है, एको है भई एको है। "डॉ जे एस ग्रेवाल (J.S. Grewal) इस संबंध में लिखते हैं - जपुजी साहिब का मूल मंत्र गुरु साहेब के परमात्मा संबंधी विचारों का पूरण स्पष्टीकरण करता है। ऐसी स्पष्ट बात किसी और भक्तों ने नहीं कहीं।

(ii) ग्रहसथ जीवन पर जोर - गुरु नानक देव जी संन्यास के विरोधी थे। वह ग्रहसथी का जीवन बतीत करते हुए, नाम सिमरन के माध्यम से भगवान की प्राप्ति की बात स्पष्ट रूप में कहते है। वह कहते है, "संसार की अशुद्धता में पवित्र रहो।" अन्य भक्तों ने संन्यास का विरोध नहीं किया।

(ii) उन्होंने अपने जीवनकाल में ही भाई लेहना को अपने उत्तराधिकारी नियुक्त करके गुरुगद्दी की संस्था को आगे बढ़ाया। अन्य भक्तों ने ऐसा नहीं किया।

(iv) संगत और पंगत - अन्य भक्तों ने अपने अनुयायियों को अच्छी तरह से संगठित नहीं किया, लेकिन गुरु नानक देव जी ने संगत (सिख भाईचारा) और पंगत (लंगर) के संस्थानों को जन्म देकर सिखों को न केवल संगठित किया बल्कि  उन्होंने अपने पंथ को एक नई दिशा भी दी। ये दोनों संस्थान अभी भी सिख धर्म का एक अभिन्न अंग हैं। लंगर प्रथा एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्था थी। यह सामाजिक और आर्थिक असमानताओं पर काबू पाने में बहुत उपयोगी साबित हुई। संगत की संस्था के कारण सिखों का भाईचारा मजबूत हुआ, उन्होंने गुरुओं की शिक्षाओं के प्रति श्रदा पैदा हुई और उनमें ही एक अलग संगठन कायम हो गया जो शायद तत्काली दुसरे मतों से भिन्न था। इस संगत के विकास के कारण, सिख धर्म के प्रचार में बहुत सहायता मिली।

(v) किरत करनी और वांट कर शकना - गुरु नानक के दर्शन का मुख्य था, किरत करनी (ईमानदारी और मेहनत से कमाया गया धन) और वांट कर शकना (जरूरत पड़ने पर दूसरों को आर्थिक सहायता देना)। अन्य उपदेशकों द्वारा ऐसा कोई सिद्धांत नहीं दिया गया है। वास्तव में, इस सिद्धांत में, गुरु साहिब ने एक आदर्श समाज के निर्माण का कार्य किया, जिसमें मेहनत और आर्थिक सहयोग को महत्व दिया जाए।

(vi) इनके अलावा, गुरु नानक देव जी ने अन्य भगतों की तुलना में गुरु भगवती और सदाचारी जीवन पर जोर दिया।  साथ ही, उन्होंने जाति पात की प्रथा, पुराने रीति-रिवाजों, अंधविश्वासों, परोहितवाद आदि का ओर भगतो की वजाय बहुत ही जोरदार शब्दों में खंडन किया।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि गुरु नानक का भक्ति आंदोलन से घनिष्ठ संबंध था, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि उनके दर्शन और उपदेश अन्य भगत सुधारकों और वैष्णव भक्तों से बहुत अलग थे। वह संत लहिर की श्रेणी में आते हैं, लेकिन वहां भी उनकी अपनी अलग पहचान है।

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