खालसा पंथ की स्थापना, कारण और नियम

1699 ई में, गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की, जो उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण सफ़लता थी। खालसा नामक एक संगठन से गुरु गोविंद सिंह जी की संगठनात्मक प्रतिभा का पता लगता है। “खालसा” शब्द का अर्थ पवित्र या शुद्ध पुरुषों का संगठन है।

दूसरे शब्दों में, खालसा उसे कहा जा सकता है जो पवित्र और सदाचारी जीवन बतीत करता है और जो अत्याचार और शोषण के ख़िलाफ़ तलवार उठाने की हिम्मत रखता हों और जो नशीली चीजों का उपयोग करने से परहेज़ करता है। खालसा की स्थापना से उन्होंने संत सैनिकों का एक समुदाय बनाया, जिनके सदस्यों ने तलवार की मदद से धर्म की रक्षा की।

खालसा की स्थापना करके गुरु गोबिंद सिंह जी ने एक कायर राष्ट्र में बहादुरी, साहस और आत्मविश्वास की भावना पैदा की। इसी खालसा के विकास के फलस्वरूप मिसल शासन और बाद में महाराजा रणजीत सिंह का स्वतंत्र खालसा राज्य की स्थापना हुई।

खालसा पंथ की स्थापना, कारण और खालसा पंथ के नियम

खालसा पंथ की स्थापना के कारण

खालसा की स्थापना के कई कारण थे, लेकिन मुख्य था गुरु साहिब की संगठनात्मक योग्यता को कहा ही जाना चाहिए।

(1) एक शक्तिशाली संगठन की आवश्यकता

गुरु बनते ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगलों के धार्मिक जुल्मों के खिलाफ लड़ने के लिए जी ने दृढ़ संकल्प किया था। उस समय एक ऐसे संगठन की जरूरत थी जो इस लंबे संघर्ष को ठोस आधार दिया जा सके और खालसा की स्थापना करके गुरु गोबिंद सिंह जी ने उस संघर्ष के लिए आधार बना लिया।

(2) औरंगजेब का धार्मिक कट्टरता

कट्टर मुग़ल सम्राट औरंगजेब लोगों के प्रति बहुत क्रूर था। गैर-मुसलमानों को जबरदस्ती मुसलमान बनाया जा रहा था। ना करने बालों को मौत की सजा सुनाई जाती थी या उन्हें जयीआ जैसा अपमान जनक टैक्स देना पड़ता था। गुरु गोबिंद सिंह जी ने लोगों में उसकी धार्मिक नीति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए और लोगों में साहस पैदा करने के लिए खालसा की स्थापना की।

(3) हिंदुओं की कायरता

खालसा पंथ की स्थापना करने के लिए हिंदुओं की कायरता भी एक कारण था। इस कायरता का अनुभव गुरु जी ने गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के समय किया था। हिंदू डर से छिपने लगें ताकि कहीं वे भी मुग़ल कट्टरता का शिकार न हो जाएं। ऐसे समय में लोगों में बहादुरी और साहस की जरूरत थी। यह किसी शक्तिशाली संगठन के बिना संभव नहीं हो सकता था।

(4) मसंदो द्वारा शोष्ण

गुरु अर्जन देव जी द्वारा स्थापित मसंद प्रथा अब सिख धर्म को कमज़ोर करने का कारण बन चुकी थी। मसंद बहुत भ्रष्ट हो गए थे। उन्होंने तो नौवें गुरु के ख़िलाफ़ षड्यंत्र भी रचे थे। गुरु जी खालसा जैसी महत्वपूर्ण संस्था की स्थापना करके मसंदो का प्रभाव समाप्त करना चाहते थे।

(5) धर्म की रक्षा

सिख धर्म सही मायने में एक शांतिप्रिय धर्म था, लेकिन गुरु अर्जुन देव जी और गुरु तेग बहादुर जी की शहादत ने यह स्पष्ट कर दिया कि धर्म की रक्षा के लिए तलवार उठानी पड़ेगी और एक निश्चित योजना बनानी होगी। इस लिए गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा की स्थापना करके सिखों को संत-सिपाही बनाने की योजना बनाई।

(6) गुरु गोविंद सिंह जी से पहले सिख धर्म का विकास

गुरु गोविंद सिंह जी से पहले सिख धर्म काफी विकसित हो चुका था। मंजी प्रथा, मसंद प्रथा,गोइंदवाल, पंजाबी भाषा, दरबार साहिब, आदि ग्रन्थ, संगत और पंगत का संकलन, गुरु हरगोबिंद की नई नीति आदि संस्थान सिख धर्म के विकास और इसकी विशिष्ट पहचान में महत्वपूर्ण साबित हुए। गुरु अर्जुन देव जी और गुरु तेग बहादुर जी की शहीदीयों ने सिख धर्म में आत्मविश्वास और स्वाभिमान की भावना जगाई। सिख संगत बलिदान की भावना से भरा था। सिख पंथ का यह विकार, इसके विभिन्न रूप और इस के संस्थानों और परंपराओं की रक्षा करना अपना पहला कर्तव्य मानना ​​शुरू कर दिया। उन्होंने महसूस किया कि यह केवल तभी हो सकता है जब एक शक्तिशाली संगठन स्थापित किया गया हो।

(7) पहाड़ी राजाओं का विरोध

गुरु साहिब ने पहाड़ी प्रदेशों में निवास करने का निर्णय इसलिए लिया था क्योंकि वहाँ उनके धर्म प्रचार के कार्यो में मुगलों का कम हस्तक्षेप हो सकें।

 लेकिन यहां भी इस राज्य के कुछ राजपूत शासकों को (जैसे भीम चंद) उनसे जलन होने लगी। हालांकि नादौन के युद्ध में, गुरु साहिब ने मुगल शासकों के ख़िलाफ़ पहाड़ी राजाओं को पूरा सहयोग दिया था। फिर भी उन्होंने गुरु साहिब को धोखा दिया और विश्वासघात किया। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए एक शक्तिशाली संगठन की बड़ी जरूरत थी।

(8) उप-संप्रदायों का विरोध

गुरु गद्दी न मिलने के कारण गुरु के परिवार के ही कुछ लोग जैसे कि प्रीथिये के उत्तराधिकारी (मीणा संप्रदाय), धीर मल्लीए और रामराईए आदि ने गुरु साहिब का बहुत विरोध किया था। गुरु अर्जुन देव जी और गुरु दग बहादुर जी की शहादत में भी इनका बहुत बड़ा हाथ था। ऐसे शत्रुतापूर्ण तत्वों से सिख भूमि की रक्षा करने के लिए, सिख समुदाय को फिर से स्थापित करना आवश्यक हो गया था। खालसा पंथ की स्थापना इस दिशा में उठाया गया एक ठोस कदम था।

(9) दोष पुर्ण जाति प्रथा

गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह महसूस किया था कि नौ गुरुओं की शिक्षा और लंगर प्रथा के बावजूद, हिंदु लोग जाति-प्रथा के भेदभावों को भुले थें। इन भेद-भावों के होते राष्ट्रीय एकता का उद्देश्य एक सपने जैसा ही था। इसलिए इस प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए यह जरूरी था कि कोई ऐसा संगठन बनाया जाए जिसके मैंबर जाति प्रथा से उपर उठकर भाई-भाई बनकर रहें और उनमें सामाजिक समानता की भावना हों।

(10) सिख जाटों का प्रभाव

अब तक सिख जाट (किसान) सिख धर्म में बहुत बड़ी संख्या में आ गई थे। उनके गुण थे - वीरता, साहस भी सिख धर्म में खुद आ गई थे। इन गुणों ने सिख धर्म के रूप को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाई। यह बात गोबिंद सिंह जी की नई नीति और खालसा की स्थापना के बारे में भी कही जा सकती है।

(11) गुरु साहिब का जीवन दर्शन

गुरु जोबिंद सिंह की आत्म कथा ‘बचित्र नाटक’ में हमें उनके जीवन दर्शन के बारे में पता चलता है। “वो कहते है कि उन्होंने साधु-संतों को उभारने और दुष्टों का नाश करने के लिए जन्म लिया है।” इस महान आदर्श की पालना करने के लिए उन्होंने खालसा जैसी शक्तिशाली संस्था स्थापित करने का बीड़ा उठाया। खालसा के नियमों के नियमों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट है कि यह संगठन सिखों को एक शातिर, बहादुर, दिलेर और जुल्म के खिलाफ संघर्ष करने वाले योद्धा बनाने में सहायक साबित हुई।

1699 ई. में आनंदपुर साहिब में भारी दीवान और खालसा की स्थापना

बैसाखी के दिन, 1699 ई. में गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में एक महान सिख सम्मेलन का आयोजन किया। जिसमें लगभग 80,000 सिखों ने हिस्सा लिया था। सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रभावी शब्दों में गुरु जी ने कहा कि मुसीबत की इस घड़ी में धर्म की रक्षा के लिए बलिदानों की आवश्यकता है। जो आदमी अपना जीवन धर्म के लिए अपना जीवन बलिदान करने के लिए तैयार है, तो वह मंच पर आ जाए। गुरु जी की पुकार सुन कर सारे सम्मेलन में सन्नाटा छा गया, लेकिन दया राम (खत्री) नाम का एक व्यक्ति आत्म बलिदान करने के लिए खड़ा हो गया। गुरु जी उसे तम्बू के पीछे ले गए और थोड़ी देर बाद खून से सनी तलवार को मंच पर लेकर आ गए और धर्म के लिए अपना जीवन देने वाले एक ओर आदमी की मांग की। इस प्रकार दया राम के अलावा धर्म दास (छिब्बा), मोहकम चंद (धोबी), साहिब चंद (नाई) और हिम्मत राय (घुमार) आदि ने अपने आप को बलिदान के लिए पेश किया। गुरु साहिब ने इन्हें पंज प्यारे कहा। इसके बाद गुरु साहिब ने उन्हें एक लोहे के बर्तन में तैयार किया हुआ खड़े का पाहुल या अमृत छकाया और उन्हें ‘खालसा’ का नाम दिया। फिर उनके हाथों से गुरु जी ने खुद अमृत छका और इस सिद्धांत को सार्थक कर दिया, कि “खालसा गुरु में है और गुरु खालसा में” या “आपे गुरु आपे गुरु चेला।” गुरु साहिब ने पंथ में प्रवेश करने वालों को पाँच कक्के धारण करने को कहा। साथ ही उनको यह (खालसा को) आदेश दिया कि वह एक वैरागी, पवित्र और नशा मुक्त जीवन बतीत करें।

खालसा पंथ के नियम

गुरु गोबिंद जी ने खालसा के लिए कुछ नियम निर्धारित किए थे जिनका पालन करना हर खालसा के लिए जरूरी था।

  1. खालसा के सदस्य केवल वही लोग बन सकते है जो नई नीति से अमृत (खंडे की राहुल) ग्रहण करेंगे।
  2. खालसा के सभी सदस्यों को अपने नाम के पीछे सिंह (शेर) शब्द लगाना होगा।
  3. उन्हें पाँच कक्के - कच्छा, कड़ा, कंघा, किरपान और केस धारण करने जरूरी होगें।
  4. उन्हें जातिगत भेदभाव से मुक्त होकर और समानता की भावना के साथ रहना होगा।
  5. उन्हें ईश्वर की एकता पर विश्वास करना होगा।
  6. खालसा सुबह उठेगा, स्नान करेगा और बाद में गुरबाणी का पाठ करेगा।
  7. उनके लिए मूर्तिपूजा की मनाही थी।
  8. वे हथियार चलाना सीखेंगे और धर्म की रक्षा के लिए कोई भी बलिदान देने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे।
  9. उन्हें तम्बाकू और नशीली चीजों का उपयोग करने के लिए मनाही थी। वे मुस्लिम तरीके से तैयार मीट (हलाल) का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
  10. उन्हें एक उच्च नैतिक-जीवन जीना होगा।
  11. उन्हें अन्य धर्मो के प्रति सहिष्णुता की नीति का पालन करना होगा।
  12. खालसा के सदस्य एक दूसरे से मिलते समय “वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह” कहेंगे। जिसका मतलब था कि खालसा भगवान का है और भगवान जीत होती है।
  13. खालसा मेहनत करके अपना गुजारा करेगा और अपनी आय का दसवां हिस्सा धर्म के लिए दान करेगा।
  14. प्रत्येक खालसा पंथ के लिए, किरत नाश, कुल नाश और कर्म नाश करेगा। इसका मतलब है कि खालसा अपने काम-धंधे, कबीले और करम-कांड का त्याग करते हुए पूरी तरह से खालसा पंथ की शरण में आना होगा और काम व्यापार, वंश और अनुष्ठानों के सभी पुराने बंधनों को तोड़ देगा।
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