गुरु हरगोबिन्द साहिब जी की जीवनी

गुरु हरगोबिंद का जन्म 14 जून, 1595 को पांचवें गुरु अर्जन के घर में वडाली नामक गाँव में जो अमृत से 15 किमी दूर है में हुआ था। उनकी माता का नाम श्रीमती री देवी था। वह अपने माता-पिता की एकमात्र संतान थे और शादी के कई साल बाद हरगोबिंद का जन्म हुआ था। उनके जन्म से गुरु अर्जुन देव जी का बड़ा भाई बहुत दुखी हुआ था।
गुरु हरगोबिन्द साहिब जी की जीवनी
उसे यह उम्मीद थी कि निःसंतान होने के कारण गुरु अर्जुन देव जी के बाद, उनका (पृथ्वी के) पुत्र मेहरबान गुरु गद्दी पर बैठेगा, लेकिन गुरु अर्जुन देव जी के घर में हरगोविंद जी के जन्म के साथ ही उनकी सारी उम्मीदें खत्म हो गई। उसके दो-तीन बार बच्चे हरगोविंद जी की हत्या की साजिश रची, लेकिन वह अपनी साजिश में सफल नहीं हो सका।

कम उम्र में, हरगोबिंद जी धार्मिक मामलों में रुचि रखते थे। गुरु हरगोबिंद जी ने संस्कृत, प्राकृत और पंजाबी साहित्य का गहन अध्ययन किया। बाबा बुड्ढा जी ने उन्हें बहादुरी की कई धार्मिक कहानियां सुनायी और अस्त्र-शस्त्र (हथियार) चलाने, शिकार खेलने और घोड़ों की सवारी करने की शिक्षा दें कर, इस कला में माहिर बन दिया।
1606 ई. में गुरु अर्जुन देव जी के बलिदान के बाद श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी 11 साल की छोटी उम्र में सिखों के छठे गुरु बन गए। उनके गुरु काल (1606-1645 ई.) सिख धर्म के स्वरूप में बदलाव के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

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