गुरु अर्जुन देव जी की जीवनी (1563 - 1606 ई.)

गुरु अर्जुन देव जी की जीवनी

गुरु अर्जुन देव जी का जन्म और बचपन

गुरु अर्जुन देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1563 ई. में गोदीवल में एक सोढ़ी खत्री वंश में हुआ था। उनके पिता का नाम गुरु राम दास और उनकी माता का नाम बीबी भानी था। वे तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके प्रिथिया चंद (प्रिथिया) और महादेव दो बड़े भाई थे। जब वह एक बच्चा थे, एक दिन वह अपने दादा गुरु अमर दास के कमरे में गया।
गुरु साहिब उस समय आराम कर रहे थे। बीबी भानी सोच रही थी कि कहीं वह अपने दादा के आराम में विघ्न न डालें, वह बच्चे को लेने के लिए कमरे में गई, तब गुरु अमर दास ने कहा कि बच्चें को यही रहने दें। “एक दिन यह मेरा दोहता बानी का बोहिता बनेगा।” मेरा दोहता एक दिन इस दुनिया में अपनी बानी के साथ भवसागर से पार कराने वाली नाव बनायेगा)।
गुरु साहिब के ये शब्द अंत में सच्ची भविष्यवाणियाँ साबित हुई। कम उम्र में, लड़के अर्जुन ने गुरुमुखी लिपि, फ़ारसी, हिंदी और संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अपने बचपन के ग्यारह साल गोइंदवाल बिताए और बाद में वह रामदास (अमृतसर) चले गए। जहाँ अमृतसर और संतोखसर में सरोवर का निर्माण कार्य चल रहा था। उन्होंने इस काम में अपना पूरा योगदान देना शुरू कर दिया।

गुरु अर्जुन देव जी की जवानी और शादी

गुरु अर्जुन देव जी की जवानी का ज्यादा हिस्सा अमृतसर में बीता था। वह पहले सिख गुरु थे जिनका पालन पोषण पुरे सिख माहौल में हुआ था। उनकी शादी फिल्लौर तहसील के एक गाँव मिऔ के किशन चंद की बेटी गंगा देवी से हुई थी। कुछ सालों बाद, उनके घर में हरगोबिंद नाम का एक सुंदर बच्चा पैदा हुआ। वही लड़का सिखों का छठा गुरु बना।

गुरु गद्दी पर बिराजमान होना

गुरु अमर दास जी ने गुरुगद्दी को अपने उत्तराधिकारी गुरु रामदास जी के परिवार में जंदी बना दिया था। इसलिए गुरु राम दास जी के बाद उनके तीन पुत्रों में से केवल एक - प्रिथिया, महादेव और अर्जुन देव को गुरु गद्दी प्राप्त करनी थी। महादेव वैरागी था, इसलिए उसे नियुक्त करने का कोई सवाल ही नहीं था। प्रिथिया एक झूठा, एक पाखंडी और धोखेबाज था। 
उन्होंने कई अवसरों पर गुरु राम दास के आदेशों का भी उल्लंघन किया। मैकालिफ के अनुसार 1580 ई. गुरु राम दास के चचेरे भाई सहारी मल्ल के बेटे का विवाह शादी लाहौर में था। वे खुद आमंत्रित करने गुरु जी के पास आया था। किसी कारणवश गुरु जी विवाह में शामिल नहीं हो पाए थे।
इसलिए उसने अपने बड़े बेटे, प्रिथिया से, उससे शादी में शामिल होने के लिए कहा, लेकिन उसने इनकार कर दिया। इसके दो कारण थे। एक तो वह उन दिनों में सिखों द्वारा प्राप्त प्रसाद और धन का हिसाब किताब रखता था और इस काम में हेराफेरी करता था। वह इस काम को छोड़कर नहीं जाना चाहता था। दुसरा उसे लगता था कि गुरु के उत्तराधिकारी की नियुक्ति का समय आ गया है।
इसी लिए वह गुरु साहिब की नजर से दूर नहीं होना चाहता था। दूसरी ओर गुरु साहिब के कहने पर अर्जुन देव जी शादी में शामिल होने के लिए लाहौर गए। वह कुछ समय तक वहाँ रहे और सिख धर्म का प्रचार करते रहे। वे इस बात का इंतजार कर रहे थे कि जब उनके पिता का संदेश आएगा तो वे लौट आएंगे। इस समय के दौरान उन्होंने गुरु साहिब को दो पत्र भेजे लेकिन ये पत्र प्रिथिया ने बीच में रख लिये। लेकिन एक आदमी के हाथ भेजा गया तीसरा पत्र गुरु राम दास के पास पहुंचा।
इस पत्र में पहले के दो पत्रों का भी उल्लेख भी किया गया था। जिन्हें प्रिथिया ने गुरु साहिब तक नहीं पहुंचने दिया। इस पर गुरु जी प्रिथिया से बहुत नाराज हो गए। उन्होंने तुरंत भाई बुडा जी को अर्जुन देव जी को लाहौर से वापस लाने के लिए भेजा। श्री अर्जुन देव की वापसी पर, गुरु साहिब ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया।
इस प्रकार अग्नि परीक्षा में उनके सफलता के बाद, श्री अर्जुन देव जी को गुरु गद्दी प्राप्त हुई। इससे प्रिथिया बहुत जला। उसने गुरु जी की बात मानने से इंकार कर दिया और गुरु गद्दी पर अपने अधिकार पर जोर दिया। गुरु रामदास जी निराश होकर गोइंदवाल चले गए। कुछ समय बाद, 1581 ई. में वह स्वर्गवास हो गए।

दोस्तों आज इस पोस्ट में हमनें आपको गुरु अर्जुन देव जी केे जीवन के बारे में बताया है। उम्मीद है कि आपको यह पोस्ट पसंद आई होगी। अगर आपका कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बाक्स में पुछ सकते हो।

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