भाई गुरदास भल्ला का जीवन

भाई गुरदास भल्ला का नाम सिख भक्तों में सबसे उल्लेखनीय है, जिन्होंने सिख गुरुओं के अलावा सिख धर्म के शुरुआती विकास में प्रमुख भूमिका निभाई। वे उच्च कोटि के विद्वान, लेखक और उपदेशक थे। उनका जीवन सरल और त्यागमई था। वह गुरु अमर दास, गुरु राम दास, गुरु अर्जुन देव जी और गुरु हरगोबिंद जी के समकालीन थे, और इन गुरुओं के समय के दौरान, भाई गुरदास भल्ला ने सिख धर्म की महान सेवा की। गुरु अर्जुन देव जी के आदेश से, उन्होंने आदि ग्रंथ को लिखित रूप दिया। पंजाब के बाहर प्रचार करने के लिए उन्होंने भी कई स्थानों की यात्रा की। भाई गुरदास जी ने शादी नहीं की। उन्होंने अपना जीवन सिख धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए समर्पित कर दिया।  

भाई गुरदास भल्ला का जीवन

प्रारंभिक जीवन - भाई गुरदास का जन्म 1558 ई के आसपास गोइंदवाल में गुरु अमर दास जी के भाई दातार चंद के घर में हुआ था। इस दृष्टिकोण से, उनका गुरु के परिवार (गुरु अमर दास के भतीजे) के साथ घनिष्ठ संबंध था। गुरु साहिबबान के संपर्क से सिख धर्म और दर्शन में उनकी रुचि जागृत हुई।


(ii) साहित्यिक गतिविधियाँ - भाई गुरदास जी पंजाबी और हिंदी का बहुत ग्यान था। वह संस्कृत भाषा भी जानते था।  वह खुद एक लेखक थे। उन्होंने 39 वारों की रचना की।  इनमें वारों में से पहली और ग्यारहवीं ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। पहली वार में गुरु नानक के जीवन और उदासियो का वर्णन मिलता है और ग्यारहवें वार में सिख गुरुओं के नाम, वंश और निवास स्थानों के बारे में  जानकारी मिलती है। इन वारों को गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज नहीं किया गया, लेकिन वे गुरु ग्रंथ साहिब को ठीक से समझने के लिए यह वारे कुंजी के रूप में काम करती हैं। 


भाई गुरदास जी का मुख्य योगदान - आदि ग्रन्थ संकलन में गुरु अर्जुन देव जी का सहयोग करना। उन्होंने आदि ग्रंथ के विषयवस्तु को इकट्ठा और संपादित करने में गुरु साहिब की बहुत सहायता की। भाई गुरदास भल्ला ने गुरु के आदेश के अनुसार पूरा आदि ग्रन्थ लिखा।


(iii) सिख धर्म के लिए अन्य योगदान - भाई गुरदास जी ने सिख धर्म के प्रचार के लिए आगरा, बनारस और पंजाब के बाहर अन्य स्थानों की यात्रा की। उन्होंने गुरु साहिब के खिलाफ किए गए प्रयासों को विफल कर दिया। गुरु साहिब के आदेश से, उन्होंने मुग़ल बादशाह अकबर को आदि ग्रंथ के कुछ श्लोकों को पढकर सुनायें, जिससे वे प्रसन्न हुए और उन्हें बहुमूल्य शॉले भेंट की। जब गुरु हरगोविंद को ग्वालियर के किले में कैद किया गया था, तब भाई गुरदास जी ने दरबार साहिब से सिखों की अगवाई की। उन्होंने गुरु हर गोबिंद की नई नीति के कारण लोगों के दिलों में फैली भ्रांतियों को दूर किया। वह गुरु जी के आदेश का पालन करते हुए, वह घोड़ों को खरीदने के लिए काबल भी गए।


मृत्यु - भाई गुरदास जी का निधन 1629 ई में गोइंदवाल में हुआ। गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने खुद उनके अंतिम संस्कार की रस्मों को पुरा किया। गुरु साहिबानों ने हमेशा सिख धर्म के प्रति उनकी सेवाओं की प्रशंसा की है। ईसाई मत में जो स्थान सेंट पाल (St. Paul) को प्राप्त है। वह स्थान सिख धर्म में भाई गुरदास जी को प्राप्त है। कई सिख श्रद्धालु उनके त्याग भरें जीवन से प्रेरणा लेते हैं।


दोस्तों आज इस पोस्ट में हमनें आपको भाई गुरदास भल्ला केे जीवन के बारे में बताया है। उम्मीद है कि आपको यह पोस्ट पसंद आई होगी। अगर आपका कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बाक्स में पुछ सकते हो।

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