गुरु अमर दास जी की जीवनी (1552 -1574 ई.)

गुरु अमर दास जी की जीवनी (1552 -1574 ई.)

गुरु अमर दास जी का जन्म, बचपन और विवाह

तीसरे सिख गुरु अमर दास जी का जन्म 5 मई, 1479 अमृतसर जिले के बसेरेके गाँव में तेजभान भल्ला नामक एक खत्री के घर में हुआ था। उनके पिता एक छोटा सा व्यवसाय चलाते थे और खेती करते थे। उनकी मां का नाम लछमी (भूप कौर, रूप कौर या बख्त कौर) थी। कम उम्र से, श्री अमरदास जी एक धार्मिक व्यक्ति थे। 23 साल की उम्र में उनका विवाह देवी चंद की बेटी मनसा देवी या माली से हो गया और उनके घर में दो पुत्र मोहन और प्रमुख और दो बेटियों बीबी दानी और बीबी भानी का जन्म हुआ। श्री अमर दास अपने पिता और भाइयों के साथ मिलकर खेती-बाड़ी और नमक-तेल का कारोबार करते थे।

गुरु अंगद देव जी की शरण में जाना

श्री अमरदास जी भगवान विष्णु के भक्त थे और वह गंगा में स्नान के लिए हर साल हरिद्वार जाते थे। एक बार वह गंगा स्नान से वापस आ रहें थे तब उनको रस्ते में एक साधु मिला जिसको उन्होंने भोजन कराया। खाने के बाद साधु को पता चला कि अमरदास जी ने अभी तक किसी भी गुरु को नहीं अपनाया है। उसका खून खोल उठा था और उसने कहा कि उसने एक गुरुहीन आदमी के हाथों से खाकर बहुत बड़ा पाप किया। संत के ये शब्द से श्री अमरदास जी पर बहुत प्रभाव पड़ा। उन्होंने महसूस किया कि गुरु के बिना मनुष्य का जीवन आध्यात्मिक रूप से बेकार है।

इसलिए उन्होंने एक पहुंचे हुए व्यक्ति को अपना गुरु बनाने का फैसला किया। एक दिन श्री अमरदास जी अपने भाई की बेटी बीबी अमरो से (जो गुरु अंगद जी की बेटी थी) गुरु नानक की बानी के मधुर वचन सुनें। यह सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने दूसरे गुरु अंगद देव जी के निवास स्थान पर जाने का निश्चय किया। वह बीबी अमरो के साथ खडुर साहिब गए और गुरु अंगद देव जी के चरणों में शरण ली।

उत्तराधिकार नियुक्त किया जाना

62 वर्ष की आयु में श्री अमर दास जी ने गुरु अंगद देव जी को अपने गुरु के रूप में अपनाया और अगले ग्यारह वर्षों (1541-1552) के लिए बड़ी भक्ति और परिश्रम से गुरु की सेवा की। वृद्ध होने पर भी वह प्रतिदिन गुरु जी के स्नान करने के लिए वे लगभग 5 किमी की दूरी पर ब्यास नदी से पानी लाते थे।

कई लोग तो उन्हें नौकर, पागल और ऊदबिलाव कहकर उनका मज़ाक उड़ाते थे, लेकिन उन्होंने इन बातों पर ध्यान न देकर वे गुरु की सेवा करते रहे। 1552 ई. सर्दियों की रात जब भारी बारिश हो रही थी, तब अमरदास जी अंधेरे में पानी लाने के लिए ब्यास नदी से लौट रहे थे। तो वे एक जुलाहे के घर के बाहर एक किले पर ठोकर खाकर गिर गए। उनकी आवाज सुनकर जुलाहे का परिवार जाग गया।

उसकी पत्नी ने कहा, "आधी रात में गिरने वाला वह मूर्ख अमरूद ही होगा।" जब अंगद जी को इस घटना के बारे में पता चला, तो उन्होंने कहा कि श्री अमरदास असहाय और बेसहारा नहीं वह तो बेघरों का समर्थन है और असहायों का समर्थन है। उसी दिन, उन्होंने 5 पैसे, इलायची और नारियल की भेंट अमर दास के चरणों में उन्होंने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और गोइंदवाल जा कर धर्म प्रचार करने के लिए कहा।

यह घटना 1552 ईस्वी में हुई थी। कुछ ही समय बाद, गुरु अंगद का निधन हो गया और श्री अमर दास गुरु बन गए। यहां यह उल्लेखनीय है कि गुरु अंगद देव जी ने भी गुरु नानक देव जी की तरह अपने पुत्रों (दातू और दसू) में से किसी को भी अपना उत्तराधिकारी न बना कर गुरु गद्दी अपने एक परम भक्त श्री अमरदास जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। गुरु अमर दास जी 1552 ई. से अपने स्वर्गवास 1574 ई. तक (लगभग 22 वर्षों तक) गुरु गद्दी पर बिराजमान रहे।

दोस्तों आज इस पोस्ट में हमनें आपको गुरु अंगद देव जी की जीवनी दी गयी है। उम्मीद है कि आपको यह पोस्ट पसंद आई होगी। अगर आपका कोई सवाल है तो आप नीचे कमेंट बाक्स में पुछ सकते हो।

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